आजकल हिन्दी की हालत उस अति आधुनिका की जैसी हो गई है जो अपनी
त्वचा दिखाने के लिए फटी जींस पहनती हैं और अपने आपको स्मार्ट दर्शाने के लिए साबुत
जींस पर भी थेगली लगा लेती है। हिन्दी कमाल की भाषा है। एक-एक शब्द के कई
पर्यायवाची। हर पर्यायवाची की अपनी छटा। जैसा लिखो वैसा ही बोलो। अब देश का ऎसा कौन
सा हिस्सा होगा जहां हिन्दी बोली और समझी न जाती होगी। लेकिन अपने आपको "मॉर्डन"
दिखाने के फेर में आप अपने घर में ही उल्टी-सीधी अंग्रेजी बोलें तो फिर क्या कहने।
पता नहीं क्यों मान लिया गया है कि अंग्रेजी में बोलने से ज्यादा पढ़े-लिखे और
स्मार्ट नजर आते हैं। हमारे साथ उल्टा है।
हम जब भी अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते
हैं अपनी ही नजर में "बोड़म" बन जाते हैं। अरे भाई उसी जुबान में बात करो न जिसे आप
दिल से बोल सको, जिसमें ह्वदय का स्पन्दन गूंजता दिखाई दे। लेकिन बेचारी हिन्दी भी
क्या करे? हिन्दी की सबसे ज्यादा हिन्दी तो बाबुओंं और नौकरशाहों ने की है। हमारे
यहां उस अधिकारी को ही समझदार माना जाता है जिसकी अंग्रेजी में पकड़ हो। चाहे उसमें
बच्चे बराबर भी तमीज न हो।
माफ करना। शक है कि हमारा यह जुमला किसी बच्चे ने सुन
लिया तो वह बुरा मान जाएगा। भाषा तो मां होती हैं। हमें हर भाषा अच्छी लगती है।
मांएं किसे अच्छी नहीं लगती। देश में दर्जनों भाषाएं हैं और सैकड़ों बोलियां। हर
बोली का अपना रंग है। जरा पंजाबी, बंगाली, मराठी के लोकगीत सुन कर देखिए आपका
रोम-रोम न थिरकने लगे तो कहना। हमें तो अंग्रेजी भी अच्छी लगती है। लेकिन किसी
विदेशी भाषा को अपने सिर पर लाद लेना कहां की बुद्धिमानी है।
माना कि अंग्रेजी
पढ़ने से विश्व ज्ञान की खिड़की खुलती है लेकिन यह क्यों नहीं सोचते कि जिन
अंग्रेजों ने संस्कृत पढ़ी है वे भी अथाह ज्ञान पाने में सफल रहे हैं। क्योंकि
दुनिया का श्रेष्ठतम ज्ञान संस्कृत में उपलब्ध है। हमारे प्रिय कवि भवानी प्रसाद
मिश्र कहते हैं- जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख और इसके बाद सबसे बड़ा तू दिख।
तो जनाब। हम तो वही लिखते हैं जो बोलते हैं, जो सुनते हैं और जैसा सोचते हैं। हमारा
दावा है कि आज हिन्दी दुनिया की श्रेष्ठतम भाषाओं में एक है।