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जननायक कर्पूरी ठाकुर : सादगी और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा समूचा जीवन

। दुर्भाग्यवश, हमने कर्पूरी ठाकुर जी को 64 वर्ष की आयु में ही खो दिया। हमने उन्हें तब खोया, जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जन-कल्याण के अपने कार्यों की वजह से करोड़ों देशवासियों के दिल और दिमाग में जीवित हैं। वे एक सच्चे जननायक थे।

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Gyan Chand Patni

Jan 24, 2024

जननायक कर्पूरी ठाकुर : सादगी और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा समूचा जीवन

जननायक कर्पूरी ठाकुर : सादगी और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा समूचा जीवन

जन्मशती पर स्मरण :

सादगी और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा समूचा जीवन

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री हमारे जीवन पर कई लोगों के व्यक्तित्व का प्रभाव रहता है। जिनसे हम मिलते हैं, हम जिनके संपर्क में रहते हैं, उनकी बातों का प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनके बारे में सुनकर ही आप उनसे प्रभावित हो जाते हैं। मेरे लिए ऐसे ही रहे हैं जननायक कर्पूरी ठाकुर। आज कर्पूरी बाबू की 100वीं जयंती है। मुझे कर्पूरी जी से कभी मिलने का अवसर तो नहीं मिला, लेकिन उनके साथ करीब से काम करने वाले कैलाशपति मिश्र जी से मैंने उनके बारे में बहुत-कुछ सुना है। सामाजिक न्याय के लिए कर्पूरी बाबू के प्रयासों से करोड़ों लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव आया। उनका संबंध नाई समाज, यानी समाज के अति पिछड़े वर्ग से था। उन्होंने चुनौतियों को पार करते हुए उपलब्धियां हासिल कीं और ताउम्र समाजोत्थान में जुटे रहे। उनका जीवन सादगी और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा। कई किस्से हैं, जो उनकी सादगी की मिसाल हैं। उनके साथ काम करने वाले याद करते हैं कि कैसे वे इस पर जोर देते थे कि उनके किसी भी व्यक्तिगत कार्य में सरकार का एक पैसा भी इस्तेमाल न हो। ऐसा ही वाकया बिहार में उनके सीएम रहने के दौरान हुआ। तब राज्य के नेताओं के लिए कॉलोनी बनाने का निर्णय हुआ था, लेकिन उन्होंने अपने लिए कोई जमीन नहीं ली। जब भी उनसे पूछा जाता कि आप जमीन क्यों नहीं ले रहे हैं, तो वे बस विनम्रता से हाथ जोड़ लेते। वर्ष 1988 में उनके निधन पर श्रद्धांजलि देने कर्पूरी जी के गांव आए नेताओं की आंखों में आंसू उनके घर की हालत देखकर आ गए कि इतने ऊंचे पद पर रहे व्यक्ति का घर इतना साधारण कैसे हो सकता है। उनकी सादगी का एक और किस्सा वर्ष 1977 का है, जब वे बिहार के सीएम बने। तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर कई नेता पटना में एकत्रित हुए। वहां मौजूद मुख्यमंत्री कर्पूरी बाबू का कुर्ता फटा हुआ था। ऐसे में चंद्रशेखर जी ने अपने अनूठे अंदाज में लोगों से कुछ पैसे दान करने की अपील की, ताकि कर्पूरी जी नया कुर्ता खरीद सकें। कर्पूरी जी तो कर्पूरी जी ही थे। उन्होंने मिसाल कायम कर पैसा तो स्वीकार कर लिया, लेकिन उसे मुख्यमंत्री राहत कोष में दान कर दिया। सामाजिक न्याय कर्पूरी जी के मन में रचा-बसा था। उन्हें ऐसे प्रयासों के लिए जाना जाता है, जिनमें सभी में संसाधनों का समान वितरण हो। आदर्शों की प्रतिबद्धता ऐसी थी कि उस कालखंड में भी जब सब ओर कांग्रेस का राज था, उन्होंने कांग्रेस विरोधी लाइन पर चलने का फैसला किया। उन्हें काफी पहले ही इसका अंदाजा हो गया था कि कांग्रेस अपने बुनियादी सिद्धांतों से भटक गई है। कर्पूरी जी की चुनावी यात्रा 1950 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में शुरू हुई। वे श्रमिकों, छोटे किसानों और युवाओं के संघर्ष की सशक्त आवाज बने। वे स्थानीय भाषाओं में शिक्षा के पैरोकार थे। डेमोक्रेसी, डिबेट और डिस्कशन तो कर्पूरी जी के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था। उन्होंने देश पर जबरन थोपे गए आपातकाल का भी पुरजोर विरोध किया। जेपी, डॉ. लोहिया और चरण सिंह जी जैसी विभूतियां भी उनसे प्रभावित हुई थीं। पिछड़े और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का उन्होंने पूरा तंत्र तैयार किया था। उन्हें उम्मीद थी कि एक न एक दिन इन वर्गों को भी वे प्रतिनिधित्व और अवसर जरूर दिए जाएंगे, जिनके वे हकदार थे। हालांकि उनके इस कदम का काफी विरोध हुआ, लेकिन वे किसी भी दबाव के आगे झुके नहीं। उनके नेतृत्व में समावेशी समाज की मजबूत नींव डालने वाली नीतियां लागू की गईं। ऐसी नीतियां, जहां किसी के जन्म से उसके भाग्य का निर्धारण नहीं होता हो। वे समाज के सबसे पिछड़े वर्ग से थे, लेकिन काम सभी वर्गों के लिए किया। हमारी सरकार जननायक कर्पूरी ठाकुर से प्रेरणा लेते हुए निरंतर काम कर रही है। यह हमारी नीतियों और योजनाओं में भी दिखाई देता है, जिससे देशभर में सकारात्मक बदलाव आया है। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही थी कि कर्पूरी जी जैसे कुछ नेताओं को छोड़कर सामाजिक न्याय की बात बस एक राजनीतिक नारा बनकर रह गई थी। उनके विजन से प्रेरित होकर हमने इसे एक प्रभावी गवर्नेंस मॉडल के रूप में लागू किया। मैं विश्वास और गर्व से कह सकता हूंं कि भारत के 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की उपलब्धि पर आज कर्पूरी जी जरूर गौरवान्वित होते। इनमें समाज के सबसे पिछड़े तबके के लोग सबसे ज्यादा हैं, जो आजादी के 70 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे। हम आज सैचुरेशन के लिए प्रयास कर रहे हैं, ताकि प्रत्येक योजना का लाभ, शत-प्रतिशत लाभार्थियों को मिले। हमारे प्रयास सामाजिक न्याय के प्रति सरकार के संकल्प को दिखाते हैं। आज जब मुद्रा लोन से ओबीसी, एसटी और एससी समुदाय के लोग उद्यमी बन रहे हैं, तो यह कर्पूरी जी के आर्थिक स्वतंत्रता के सपनों को पूरा कर रहा है। यह हमारी सरकार है, जिसने एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ाया है। हमें ओबीसी आयोग (दु:ख की बात है कि कांग्रेस ने इसका विरोध किया था) की स्थापना करने का भी अवसर प्राप्त हुआ, जो कर्पूरी जी के दिखाए रास्ते पर काम कर रहा है। पीएम-विश्वकर्मा योजना भी देश में ओबीसी समुदाय के करोड़ों लोगों के लिए समृद्धि के नए रास्ते बनाएगी। पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले एक व्यक्ति के रूप में मुझे जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिला है। मेरे जैसे अनेकों लोगों के जीवन में कर्पूरी बाबू का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। मैं उनका सदैव आभारी रहूंगा। दुर्भाग्यवश, हमने कर्पूरी ठाकुर जी को 64 वर्ष की आयु में ही खो दिया। हमने उन्हें तब खोया, जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जन-कल्याण के अपने कार्यों की वजह से करोड़ों देशवासियों के दिल और दिमाग में जीवित हैं। वे एक सच्चे जननायक थे।