
प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (फोटो- AI)
डॉ. एन.के. सोमानी, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
इस्लामाबाद में अमरीका व ईरान के बीच युद्ध विराम समझौते को लेकर हुई वार्ता बिना किसी निष्कर्ष तक पहुंचे समाप्त हो गई। कहा जा रहा है कि ईरान और अमरीकी अधिकारियों के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, परमाणु संवर्धन का अधिकार और प्रतिबंधों में राहत को लेकर सहमति न बन पाने के कारण वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म करनी पड़ी। वार्ता की विफलता के लिए ईरान ने वाशिंगटन को जिम्मेदार ठहराया है तो दूसरी तरफ अमरीका का कहना है कि उसके प्रतिनिधिमंडल ने लचीला और सहयोगात्मक रूख अपनाया, पर तेहरान के अडिय़ल रवैये के कारण वार्ता अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी। जिस अविश्वास और आपसी धमकियों के माहौल में दोनों पक्षों के बीच यह वार्ता हुई उसमें साफ था कि दशकों से चली आ रही समस्याओं का समाधान इस्लामाबाद की कुछ घंटों की बातचीत में होना मुश्किल है।
ऐसे में सवाल यह है कि कूटनीतिक समाधान के प्रयासों की विफलता के बाद अब मध्यपूर्व का क्या होगा? क्या सीजफायर आगे बढ़ेगा या खाड़ी में बमबारी जारी रहेगी? वार्ता की विफलता के बाद अमरीका की ओर से जो बयान आ रहे है, उसे देखकर तो यही लग रहा है कि मध्यपूर्व में युद्ध का दायरा और बढ़ेगा।
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ईरानी सभ्यता को समाप्त कर देने की धमकी के बाद गत सप्ताह जब ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉॅर्म ट्रुथ पर 15 दिनों के अस्थायी युद्ध विराम की घोषणा की तो यह विश्व समुदाय के लिए राहत की बड़ी खबर बनी। ट्रंप की घोषणा के बाद ईरान पर अमरीका के हमले रुक गए। ईरान ने भी अमरीकी बेस पर हमले बंद कर दिए। शांति के स्थायी समाधान के लिए इस्लामाबाद में होने वाली बैठक के लिए अनुकूल माहौल बनता दिखा, लेकिन घोषणा के कुछ ही घंटों के बाद इजरायल ने लेबनान पर हमला कर अपनी मंशा जाहिर कर दी। हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए जब कि डेढ़ हजार से अधिक लोग घायल हुए। पिछले तीन दशकों में लेबनान पर इजरायल का यह सबसे बड़ा हमला था। इजरायल का कहना था कि लेबनान युद्ध विराम का हिस्सा नहीं है इसलिए ईरान के साथ किया गया समझौता हिजबुल्लाह पर लागू नहीं होता है। बाद में ट्रंप ने भी यह बात दोहराई। दूसरी ओर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान और ईरान का मानना था कि लेबनान का फ्रंट भी 28 फरवरी के बाद (ईरान पर हमला) ही खुला था इसलिए लेबनान भी युद्ध विराम का हिस्सा होना चाहिए। हालांकि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस्लामाबाद पंहुचने से पहले वाशिंगटन प्रशासन ने इजरायल से लेबनान पर हमले रोकने का आग्रह किया। अमरीकी दबाव के बाद नेतन्याहू के तेवर नरम भी पड़े, पर वार्ता के दौरान वाशिंगटन अपने 15 सूत्री प्रस्ताव पर और तेहरान 10 सूत्री प्रस्ताव पर अड़ा रहा। मांगों को एकदम से स्वीकार या अस्वीकार करना किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं था। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान व उसके प्रधानमंत्री व फील्ड मॉर्शल की सारी कवायद चौपट हो गई।
सच तो यह है कि परमाणु प्रतिबंधों पर तेहरान के अडिग रहने के पीछे रणनीतिक सोच छिपी है। उसका मानना है परमाणु क्षमता उसे इजरायल व अमरीकी हमलों के खिलाफ एक ’डेटरेंस’ प्रदान करती है। गतिरोध का दूसरा बड़ा मुद्दा होर्मुज स्ट्रेट का रहा। अमरीका चाहता है कि होर्मुज से माल और तेल वाहक जहाजों का परिवहन पूरी तरह से खुल जाए और किसी तरह की रोक-टोक न हो जबकि ईरान इस पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। उसने टूक कहा कि जब तक होर्मुज को लेकर कोई साझा ढंाचा तय नहीं होता है तब तक होर्मुज की स्थिति नहीं बदलेगी। यद्यपि वार्ता के बीच में यह भी खबर आई थी कि ईरान होर्मुज खोलने के लिए तैयार हो गया है, लेकिन उसका कहना था कि होर्मुज में बिछाई गई माइंस की सही लोकेशन का पता नहीं है।
सच तो यह है कि ईरान इन माइंस का उपयोग होर्मुज पर अपनी पकड़ बनाए रखने और अमरीका व उसके सहयोगियों पर दबाव डालने के लिए एक रणनीतिक उपकरण के रूप इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी ओर समाचार यह भी है कि अमरीकी नौसेना ने होर्मुज से माइंस हटाने और सुरक्षित मार्ग बनाने के लिए ऑपरेशन शुरू कर दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मध्यपूर्व पहले की तरह ही हिंसा और संघर्ष की आग मे धधकता रहेगा या अमरीका, इजरायल और ईरान दुनिया को संभावित ऊर्जा संकट से बचाने के लिए अपने अंह को त्यागकर जल्द ही किसी सर्वमान्य फार्मूले पर आगे बढ़ते दिखेंगे।
Published on:
13 Apr 2026 04:05 pm
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