18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बैंकिंग सेक्टर और भी अहम हुआ क्योंकि..फिर गली निकाली, सरकार के लक्ष्य बैंकों पर छोड़े

उम्मीद की जा सकती है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त ऋण बैड लोन में नहीं बदलेंगे। इसलिए राजस्व भरपाई जैसे उपायों की जरूरत नहीं पड़ेगी    

2 min read
Google source verification

कोरोना महामारी के चलते उपजे आर्थिक हालात से निपटने के लिए सरकार ने जिन उपायों की घोषणा की है, उन पर आरबीआई के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल व पूर्व उप गवर्नर विरल आचार्य ने अपनी पुस्तकों में कुछ सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला है कि सरकार द्वारा बैंकिंग क्षेत्र का प्रबंधन किस प्रकार गया है। इसे तीन चरणों में बांटा जा सकता है। वर्ष 1969 और 1980 में जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ तब सरकार की मंशा बैंकिंग तंत्र पर नियंत्रण करने की थी। यह नियंत्रण धीरे-धीरे बैंकों पर स्वामित्व में बदलने लगा और इसका दायरा बैंकिंग व्यवस्था और संचालन स्तर तक बढऩे लगा।

कई सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बैंकों के माध्यम से हुआ। जैसे बीस सूत्री कार्यक्रम और एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम। बैंक एक प्रकार से सरकार का ही एक अंग बन गए थे, जिनकी ऋण पुस्तिका पर भी सरकारी नियंत्रण हो चला था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के ब्यौरे से स्पष्ट है कि जनता की बचत सरकार का राजकोषीय घाटा भरने में काम आई। सरकार, आरबीआइ और बैंकों के बीच का भेद मिटाने के लिए इतना काफी है। इस प्रकार यह इन तीनों को त्रिवेणी संगम कहा जा सकता है।


वर्ष 1991 के बाद हालात बदले। इस त्रिवेणी के बीच दो रेखाएं खींच दी गई। बैंकिंग क्षेत्र को व्यापकता मिली। नए प्राइवेट बैंक आए जो तेजी से आगे बढ़े। वर्ष 2003 में फिस्कल रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजटरी मैनेजमेंट विधेयक (एफआरबीएम) पारित किया गया। इसके साथ ही स्वमौद्रीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो गई। अब सरकार और बैंकों के बीच थोड़ा फासला आया। अब बैंकों की जवाबदेही बढ़ गई थी। एफआरबीएम लागू होने के बाद आरबीआई भी सरकार से कुछ अलग हुआ। अब बैंक सरकार का अंग न रह कर ऐसे स्वतंत्र संस्थान बन गए और जरूरत पडऩे पर सरकार उन्हें पूंजी उपलब्ध करवा सकती है। खास बात यह है कि प्राइवेट क्षेत्र के बैंक नियमन के दायरे से बाहर रखे गए।


कोरोना संकट के बाद जारी पैकेज से बैंक 1991 से पहले वाले दौर में लौटते दिख रहे हैं। यानी बैंक बिना एनपीए और पूंजीकरण की परवाह किए नए ऋण जारी कर सकते है। यह ठीक वैसा ही है जैसे क्रेडिट लक्ष्य निर्धारण करने के बाद उसे सीधे राजस्व से फंड दिया जाए। फर्क इतना है कि इस बार प्राइवेट बैंक भी सरकार की इस व्यवस्था में शामिल हैं। वर्ष 1991 से पूर्व और आज के समय में एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह भी है कि तब माना जाता था कि बैंक सरकार के इशारे पर काम करते हैं तो अब यह स्पष्ट है कि सरकार के लक्ष्य बैंकों पर छोड़ दिए गए हैं।

यानी राजस्व निर्भरता की गली एक बार फिर निकाल ली गई है। लगता है पटेल और आचार्य ने बैंकों में राजस्व की बढ़ती भूमिका से होने वाले सम्भावित नुकसानों को लेकर जो आशंका जताई है, वह निर्मूल नहीं है। आजकल सब्सिडी और प्रत्यक्ष भुगतान को भी बैंकों से सीधे जोड़ दिया गया है। इससे वित्तीय क्षेत्र भी प्रभावित होता है। फिलहाल यह उम्मीद की जा सकती है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त ऋण बैड लोन में नहीं बदलेंगे। इसलिए भविष्य में राजस्व भरपाई जैसे उपायों की जरूरत नहीं पड़ेगी।