18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

(ऑडियो): न्यायपालिका की निष्पक्षता

लेकिन किताबों से बाहर नजर दौड़ाओ तो पता चलता है कि देश में कानून की धाराएं भले सबके लिए एक-सी होंगी लेकिन अदालती कार्रवाई के दौरान बड़े-बड़े वकीलों की फौज इनके मायने जरूर बदल देती है।

2 min read
Google source verification

image

afjal khan

May 12, 2015

कानून की किताबों में लिखा होगा कि कानून अंधा होता है और उसकी नजर में अमीर-गरीब, छोटे-बड़े और राजा-रंक में कोई अंतर नहीं होता।

लेकिन किताबों से बाहर नजर दौड़ाओ तो पता चलता है कि देश में कानून की धाराएं भले सबके लिए एक-सी होंगी लेकिन अदालती कार्रवाई के दौरान बड़े-बड़े वकीलों की फौज इनके मायने जरूर बदल देती है।

सप्ताह भर के भीतर देश ने न्यायपालिका के दो ऐसे उदाहरण देखे जिसने न्यायपालिका के प्रति आस्था को डगमगाया। शराब पीकर गाड़ी चलाने और गैर-इरादतन हत्या के मामले में सेशन कोर्ट से पांच साल की सजा सुनाए जाने के बाद एक घंटे में अभिनेता सलमान खान को जमानत मिल जाती है।

दो दिन बाद हाईकोर्ट इस सजा पर रोक लगा देता है। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को विशेष न्यायालय आय से अधिक सम्पत्ति मामले में चार साल की कैद और सौ करोड़ के जुर्माने की सजा सुनाता है।


साढ़े सात महीने बाद कर्नाटक हाईकोर्ट दस सेकंड में इसी मामले में उन्हें बरी कर देता है। इन मामलों में दो बड़े लोगों को निचली अदालत से सजा मिलते भी देश ने देखी और ऊपरी अदालतों से राहत मिलते भी देखी। यह वही जयललिता हैं जिनके घर छापे में 82 किलोग्राम सोना, 800 किलोग्राम चांदी, 10 हजार साडि़यों के अलावा चेन्नई-हैदराबाद में फार्महाउस, तमिलनाडु में कृषि भूमि और नीलगिरी में चाय बागान के कागजात बरामद हुए थे।

निचली अदालत में सत्रह साल मामला चलने के बाद 27 सितम्बर 14 को जयललिता को सजा सुनाई गई लेकिन अब वे बाइज्जत बरी हैं। जनता यह नहीं समझ पा रही कि सच क्या है? सत्रह साल के बाद आया वो या साढ़े सात माह बाद आया वो? ये दो तो ताजे उदाहरण हैं लेकिन मायावती, मुलायम सिंह, लालू, बी.एस. येड्डियुरप्पा, जगन मोहन रेड्डी, बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के मामले भी जनता भूली नहीं है।

जनसेवा के लम्बे-चौड़े वादे करने वाले इन नेताओं के खिलाफ भी आय से अधिक सम्पत्ति के मामले चल रहे हैं लेकिन नतीजे के रूप में सिर्फ तारीखें लग रही हैं। ये नेता और इनकी पार्टी केन्द्र सरकार के साथ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती हैं तो सीबीआई कुंभकर्णी नींद सोई रहती है और केन्द्र में इनके विरोधियों की सरकार आ जाए तो वह सक्रिय हो उठती है।

सवाल ये नहीं कि सलमान को इतनी जल्दी राहत कैसे मिल गई और जयललिता बरी कैसे हो गईं? सवाल ये है कि क्या आम आदमी के मामले में भी न्यायपालिका इतनी ही सक्रिय नजर आती है। इसका आत्मावलोकन तो न्यायपालिका ही बेहतर ढंग से कर सकती है।

लोकतंत्र में इस बात का भी बड़ा महत्व है कि किसी भी सरकारी या अदालती निर्णय पर जनता क्या सोचती है। यह सोच सरकार के विरोध या अदालत की अवमानना जैसे शब्दों से कहीं बड़ा और असरकारी होता है। यदि अदालती निर्णयों को भी जनता सरकार के सदन में बहुमत जैसे सवालों से जोड़ने लगे तब तो फिर सरकार और न्यायपालिका ही नहीं, लोकतंत्र का भविष्य भी सवालों के घेरे में है।

ये तो ताजा उदाहरण हैं लेकिन मायावती, मुलायम सिंह, लालू यादव, बी.एस. येड्डियुरप्पा, जगन मोहन रेड्डी, बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के मामले जनता भूली नहीं है।