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संपादकीयः एआइ की चकाचौंध में विवेक का दीया भी जरूरी

सरकार को एआइ प्लेटफॉम्र्स के लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे और डेटा सुरक्षा कानून सख्ती से लागू करना होगा। साइबर जांच के लिए पुलिस तंत्र को आधुनिक बनाना और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समय की मांग है। यह जिम्मेदारी अभिभावकों की भी है।

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तकनीक हर युग में जीवन को आसान बनाती रही है, लेकिन हर नई तकनीक अपने साथ जोखिमों का नया संसार भी लाती है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) उसी मोड़ पर है। फोटो से कैरिकेचर और कुछ सेकंड में तैयार डिजिटल पहचान- यह रोमांचक है, लेकिन इसके पीछे छिपा खतरा कम नहीं है। एआइ प्रयोगों की अंधी होड़ यदि बिना सावधानी के बढ़ी, तो यह समाज के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। सोशल मीडिया पर इन दिनों अपनी फोटो से एआइ कैरिकेचर या डिजिटल अवतार बनवाने का चलन है। यह महज मनोरंजन नहीं, बल्कि साइबर अपराधियों के लिए 'डिजिटल कुंडली' तैयार करना है। एक तस्वीर से चेहरे की बनावट और भाव-भंगिमा जैसे संवेदनशील बायोमेट्रिक डेटा निकाले जा सकते हैं। हमें समझना होगा कि यदि कोई ऐप 'मुफ्त' मनोरंजन दे रहा है, तो असल में हम ग्राहक नहीं, हमारा डेटा ही उनका असली 'उत्पाद' है।

खतरा केवल पहचान चोरी तक सीमित नहीं है। डीपफेक तकनीक से किसी का चेहरा या आवाज इस्तेमाल कर ठगी की घटनाएं बढ़ रही हैं। यहां एक बड़ा जोखिम 'स्थायी डिजिटल फुटप्रिंट' का भी है। आज मजे के लिए अपलोड की गई जानकारी इंटरनेट से कभी पूरी तरह मिटती नहीं और भविष्य में कॅरियर या सामाजिक छवि के लिए संकट बन सकती है। तकनीक जितनी तेजी से बढ़ रही है, अपराध भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में पहली जिम्मेदारी नागरिक की है। डिजिटल दुनिया में हमें वही 'डिजिटल हाइजीन' अपनानी होगी, जो घर की सुरक्षा के लिए अपनाते हैं। अनजान ऐप्स पर फोटो अपलोड करने से बचें, प्राइवेसी सेटिंग्स मजबूत रखें और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का उपयोग करें।

किसी भी प्लेटफॉर्म की पॉलिसी पढ़े बिना निजी जानकारी साझा करना खुद को जोखिम में डालना है, लेकिन जिम्मेदारी केवल जनता की नहीं है। सरकार को एआइ प्लेटफॉम्र्स के लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे और डेटा सुरक्षा कानून सख्ती से लागू करना होगा। साइबर जांच के लिए पुलिस तंत्र को आधुनिक बनाना और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समय की मांग है। यह जिम्मेदारी अभिभावकों की भी है। उन्हें पहले खुद जागरूक होना पड़ेगा। नए जमाने की नई तकनीकों के विषय में जानकारी लेना भी उतना ही जरूरी है, जितना भविष्य के लिए निवेश करना। क्योंकि आप ऐसा नहीं करते हैं तो छोटी सी चूक आपके लिए घातक साबित हो सकती है। हर उम्र के व्यक्ति को अपने आसपास हो रहे बदलावों के विषय में जानकारी रखना बेहद आवश्यक है।

तकनीक अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती- उपयोग उसे दिशा देता है। एआइ का भविष्य इसी पर निर्भर है कि हम उसे जिम्मेदारी से अपनाते हैं या अंधी दौड़ में जोखिमों को नजरअंदाज करते हैं। एआइ की चकाचौंध में विवेक का दीया जलता रहना चाहिए, तभी तकनीक सहायक बनेगी, संकट नहीं। एआइ को 'स्वामी' बनाने के बजाय 'सेवक' बनाए रखना ही मानव बुद्धिमत्ता की असली जीत होगी।