
स्पर्धा बढ़ाएं, संरक्षण घटाएं और समृद्धि लाएं
प्रदीप मेहता
कट्स इंस्टीट्यूट ऑफ रेगुलेशन एंड कंपटीशन के चेयरमैन
भारत को अपनी व्यापार नीति में किसी भी संरक्षणवाद को बढ़ावा देने से बचने पर ध्यान देना होगा। पिछले कुछ वर्षों में व्यापार और आर्थिक नीति में सुधारों को उन उपायों के साथ मिलाने की प्रवृत्ति रही है, जो प्रभावी रूप से आयात को कम करने और घरेलू उत्पादकों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के उद्देश्य से हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि, 'मेरा मानना है कि विदेशों से आयातित माल की बजाय भारत में निर्मित सामान को अपनाने की जरूरत है, चाहे वह दूसरे दर्जे के ही क्यों न हों। तब से लेकर अब तक कई दशक बीत चुके और आर्थिक उदारीकरण को भी 30 से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। अब समय आ गया है की संरक्षणवाद को बढ़ावा देने वाली नीतिगत सोच का पूरी तरह से परित्याग कर दिया जाए।
संरक्षणवादी सोच को चुनौती देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में तब सुर्खियां बटोरीं, जब दावोस में विश्व आर्थिक मंच में भाषण देते हुए उन्होंने दुनिया को संरक्षणवाद के युग में वापस ले जाने वालों को फटकार लगाई। आज यह पूछने जी आवश्यकता है कि क्या हमारी नीतिगत कथनी एवं करनी एक समान है ? तुलनात्मक रूप से देखें तो हम पाते हैं कि भारत प्रतिद्वंद्वी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं विशेष रूप से दक्षिणपूर्व एशिया की तुलना में उच्च आयात शुल्क स्तर बनाए रखता है। यद्यपि भारत ने हाल ही में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर करने में नए सिरे से रुचि दिखाई है। गौरतलब है कि भारत कई महत्त्वपूर्ण मेगा-क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्थाओं का सदस्य नहीं है।
हमें इस मानसिकता से खुद को मुक्त करने की आवश्यकता है कि भारतीय उद्योग विदेशी उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते है। व्यापार घाटे को आवश्यक तौर पर हानिकारक समझना एवं व्यापार उदारीकरण को हमारी अर्थव्यवस्था के संवेदनशील क्षेत्रों में नौकरियों के लिए अहितकर समझना कच्चा अर्थशास्त्र माना जाएगा। हमने पिछले 25 वर्ष में देखा है कि मौका मिले तो भारतीय उद्यमी कमाल कर सकते हैं। सुरजीत भल्ला की अध्यक्षता में भारत के व्यापार पर उच्च-स्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी) की 2019 की रिपोर्ट मेें कहा गया था कि निर्यात और आयात दोनों ही स्पर्धा की क्षमता को मजबूती देते हैं। हाल ही में, भारत के डेयरी क्षेत्र को लेकर नीति आयोग के कृषि विशेषज्ञ रमेश चंद ने चेतावनी दी है कि अगर कोई देश समुचित आयात करने का अनिच्छुक हो या असमर्थ हो ,तो वह दमदार निर्यात नहीं कर सकता है। इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है। समय की आवश्यकता है की टैरिफ निर्धारण के लिए एक समर्पित स्वतंत्र टास्क फोर्स गठित की जाए एवं उसी के माध्यम से टैरिफ की आवधिक समीक्षा को संस्थागत बनाया जाए। ऐसा करके हम आयात एवं निर्यात में संतुलन एवं आर्थिक सशक्तीकरण की राह पर आगे बढ़ पाएंगे। वित्त और वाणिज्य मंत्रालयों के बीच अधिक समन्वयन से भारत की टैरिफ नीति को अधिक सुसंगत दृष्टिकोण अपनाने में भी मदद मिलेगी। ये व्यापार नीति पर उन सिफारिशों की एक शृंखला का भी हिस्सा थे, जो कट्स इंटरनेशनल द्वारा हाल ही में सरकार के वाणिज्य विभाग को प्रदान किए गए हैं। टैरिफ की समय-समय पर समीक्षा कर हम वर्तमान में चल रहे मुक्त व्यापार समझौतों में भारतीय हितों की सुरक्षा कर सकते हैं।
बातचीत के जरिए उन टैरिफ रियायतों को प्राप्त करने की आवश्यकता है, जो भारतीय उत्पादकों द्वारा आयातित इनपुट की सस्ती सोर्सिंग को सक्षम बना सकें और घरेलू प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें। प्रतिस्पर्धा की यह क्षमता व्यापार उपचारात्मक उपायों जैसे एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग शुल्कों के अंधाधुंध आरोपण के माध्यम से हासिल नहीं की जा सकती है। भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एचएलएजी रिपोर्ट और उपरोक्त रणनीतियों को अपनाने की महती आवश्यकता है। आसान भाषा में कहा जाए, तो आर्थिक समृद्धि लाने के लिए स्पर्धा बढ़ानी होगी और संरक्षणवाद का मोह छोडऩा होगा। यह जितना जल्दी समझ आ जाए, उतना अच्छा है।
Published on:
24 May 2023 09:24 pm
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