
आरन पटेल
‘अर्थ फोकस कान्हा’ के सह-संस्थापक
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प्रकृति से लेने ही लेने वाले संबंधों पर आधारित आधे-अधूरे विकास की अवधारणा अपनाने के बजाय भारत इस ग्रह और इस पर रहने वाले लोगों के लिए बेहतर दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ सकता है। इस अवसर को यथार्थ रूप देने के लिए जलवायु आधारित शिक्षा प्रणाली जरूरी है। इससे भारतीयों को अवसर मिलेगा कि वे अतिसंवेदनशीलता छोड़ प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ें, प्रकृति आधारित अर्थव्यवस्था में युवा उद्यमी बनें, जलवायु संबंधी आपदाओं के चलते विस्थापित हुए बच्चों को परिवर्तनकारी शिक्षा मिले और वे हरित रोजगार पाने के मार्ग पर चलें।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप27 में भारत ने अपनी दीर्घावधि वाली कम उत्सर्जन एवं विकास की रणनीतियां जारी कीं, जिनसे कार्बन संबंधी क्षेत्रों, जैसे विद्युत, उद्योग एवं परिवहन की प्राथमिकताएं रेखांकित की गईं। साथ ही दीर्घकालिक उपभोग एवं उत्पादन के लिए एक जन आंदोलन के तौर पर ‘पर्यावरण के लिए जीवनशैली’ (लाइफस्टाइल फॉर इन्वायरनमेंट यानी लाइफ) की भूमिका पर जोर दिया गया। लोगों के व्यवहार में परिवर्तन से लेकर बाजार के पुन: आकार लेने तक ‘लाइफ’ आंदोलनों में शिक्षा की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इसमें पृथ्वी ग्रह को तपाने वाली गैसों में कटौती की संभावनाएं हैं।
जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आइपीसीसी) के अनुसार, इससे संबंधित कार्यवाहियों के सहयोग से 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 40-70 प्रतिशत की कटौती की संभावना है। हालांकि शिक्षा क्षेत्र व छात्रों के सामने कई परेशानियां आती हैं। पहली, महामारी के चलते स्कूल बंद रहने से सीखने की दक्षता में कमी आई, जो परीक्षा में मिले कम प्राप्तांकों में परिलक्षित हो रहा है। इससे दीर्घावधि में उत्पादकता और प्रति व्यक्ति आय के स्तर प्रभावित होंगे। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के एक शोध-पत्र के अनुसार, एक साल तक स्कूल बंद रहने से इस सदी के मध्य तक जीडीपी स्तर 1.1 से 4.7 प्रतिशत तक कम रहने की संभावना है। कोविड-19 के दुष्प्रभावों के चलते भारतीयों की एक पीढ़ी की आर्थिक गतिशीलता प्रभावित हो सकती है और सार्वजनिक वित्त की गणना बदल सकती है। दूसरी, जलवायु परिवर्तन के चलते बच्चों के सीखने की क्षमता और स्वास्थ्य पहले से ही प्रभावित हो रहे हैं। जैसे कि अत्यधिक तापमान छात्रों की सीखने की क्षमता कम करता है और शारीरिक हानि पहुंचाता है। गंभीर रूप से आने वाली बाढ़ के कारण कई परिवार स्थायी रूप से विस्थापित हो रहे हैं। इससे बच्चे, खास तौर पर लड़कियां स्कूल छोडऩे को मजबूर हैं और कम पारिवारिक आय के चलते उन्हें तस्करों को सौंप दिया जाता है या बाल श्रम में धकेल दिया जाता है। जैसे-जैसे ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के बार-बार घटित होने की संख्या बढ़ रही है, हमें आधारभूत ढांचा, सामग्री और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की अदायगी सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि उन सबसे कमजोर नागरिकों की रक्षा कर सकें जिनमें से ज्यादातर जलवायु शरणार्थी होंगे। तीसरी, जलवायु के कारण आई आपदाएं और भविष्य को लेकर चिंता युवाओं में निराशा व भय का कारण बन रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार चक्र इस निराशा को बढ़ाते हैं, लेकिन ये उतना नहीं टिकते कि नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में उल्लेखनीय कटौती जैसी उपलब्धियों के प्रति व्यापक समझ विकसित हो सके और हम वास्तविक चुनौतियों को महसूस कर पाएं।
अत: शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो आपदाओं को टाले और अवसरों का सृजन करे। राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु आधारित शिक्षा व्यवस्था के लिए सशक्त प्रारूप हो जिसमें पाठ्यक्रम से लेकर पोषण एवं जलवायु परिवर्तित विश्व में स्कूल इमारतों के कोड तक समाहित किए जा सकते हैं।
एक सीमा के भीतर सार्वजनिक विद्यालय व्यवस्था न केवल शिक्षा का स्रोत है बल्कि लाखों लोगों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का भी माध्यम है। यूनिसेफ के हाल ही में जारी एक पत्र के अनुसार, भारत को शिक्षा प्रदाताओं, छात्रों, मानवशास्त्र व विज्ञान विशेषज्ञों तथा संबंधित मंत्रालयों व विभागों के साथ परामर्श कर यह प्रारूप तैयार करना चाहिए। राज्यों व जिलों में इसका स्वरूप और क्रियान्वयन मौजूदा स्थानीय आवश्यकताओं एवं अनुमानित जलवायु खतरों के अनुरूप तय किया जाना चाहिए। इसमें आधारभूत निवेश भी शामिल किए जा सकते हैं ताकि तूफान संभावित क्षेत्रों में स्कूल भवनों का इस्तेमाल आपातकालीन आश्रय के तौर पर भी किया जा सके। साथ ही बड़े शहरों में स्थित सरकारी स्कूलों की क्षमता जलवायु प्रवासियों के गंतव्य के रूप में इस्तेमाल के लिए बढ़ाई जाए ताकि वहां बच्चों के समेकन के साथ उनका सशक्तीकरण भी संभव हो सके। सभी स्कूलों में समान रूप से स्वच्छ जल व पोषक भोजन तक बच्चों की पहुंच हो, छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों को सहानुभूतिपूर्वक पूरा किया जाए और उनके सामाजिक व भावनात्मक प्रशिक्षण पर जोर दिया जाए।
पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक व तकनीकी ज्ञान के साथ ही स्वदेशी व स्थानीय जानकारियां समाहित होनी चाहिए। पहले से ही कई नवोन्मेषी पहल चल रही हैं, जहां गैर सरकारी संगठन समुदायों के साथ मिलकर शानदार कार्य कर रहे हैं। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान - जहां छात्र पुनरुत्पादक कृषि के साथ जैव विविधता संरक्षण के बारे में सीख रहे हैं - से लेकर बेंगलूरु - जहां युवा अपशिष्ट प्रबंधन से लेकर झील पुनरुद्धार के प्रयासों में लगे हैं ताकि अपने शहर को जीवंत बना सकें - तक ऐसे प्रयास जारी हैं। प्रशिक्षण के साथ ही रटने की बजाय समालोच्य सोच पोषित करना भी जरूरी है ताकि अगली पीढ़ी के सामने स्पष्ट विकल्प मौजूद हों। एक ओर जहां हमें प्रचुरता और समानता के लिए प्रयास करने चाहिए, वहीं समाज और लोगों को अभाव एवं दुविधाओं पर समझौते करने की भी जरूरत होगी। हो सकता है कुछ लोग कहें कि जलवायु शिक्षा पूरे समाज को मिलनी चाहिए, न केवल प्राथमिक व माध्यमिक स्तर के। ऐसे में जबकि इन दिनों उद्योगों में एक हरित अर्थव्यवस्था में सीमित भविष्य वाले कामगारों को बरकरार रखने की जरूरत पर बल दिया जा रहा है, तब कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में तकनीकी शिक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी हो जाता है ताकि हम विकार्बनीकरण के पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकें। दशकों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में निवेश का विकास में बड़ा योगदान है और दीर्घकाल में यह सार्वजनिक वित्त के लिए सकारात्मक संकेत है।
इसके अतिरिक्त हम जलवायु तकनीक संबंधी शोध व अनुसंधान और नवाचार के लिए तकनीकी प्रशिक्षण पर ही फोकस करने का जोखिम नहीं ले सकते। बजाय इसके हमें सामाजिक परिवर्तनों के प्रति विश्लेषणात्मक क्षमताएं विकसित कर सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। अल्पकालिक सोच का दायरा लक्षणों तक ही सीमित रहता है, कारण की जड़ तक नहीं पहुंचता। इसका नतीजा यह होगा कि हम एक सीमित संसाधन समूह से ऐसे ही दूसरे समूह के बीच मांग को स्थानांतरित करते रहेंगे। पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार एलिजाबेथ कोल्बर्ट के शब्दों में द्ग ‘‘अदृश्य हाथ’ हमेशा ज्यादा पाने के लिए फैलते हैं।’ उपभोक्ताओं की पसंद से लेकर नवाचार, नीति से लेकर वित्त सहित हरित अर्थव्यवस्था का हर पहलू ऐसी सशक्त शिक्षा व्यवस्था से सुदृढ़ होगा, जो कि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हो। यह पर्यावरण के लिए ऐसी भारतीय जीवनशैली का कारक हो सकती है जिसकी जड़ें हमारी समृद्ध सभ्यता में मौजूद हैं। यह जीवनशैली निश्चित रूप से एक ऐसा मॉडल और आंदोलन बन जाएगी, जिसका अनुसरण पूरा विश्व करेगा।
Updated on:
07 Dec 2022 06:03 pm
Published on:
06 Dec 2022 07:06 pm
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