
-राकेश हरि पाठक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार
मौर्य एवं गुप्त वंश का काल प्राकृतिक और सांस्कृतिक समृद्धि के कारण स्वर्ण युग कहलाया। इस समय भारत वैश्विक व्यापार का प्रमुख केंद्र था। प्राचीन साहित्य में देश की आर्थिक आकर्षण क्षमता व समृद्धि की गौरव गाथाएं भरी पड़ी हैं। विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के समय भारत अपनी सबसे कमजोर आर्थिक स्थिति में था। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और उससे पहले संपदा-लोलुप आक्रमणों के बाद देश एक नाजुक, कृषि-प्रधान और कम विकास दर वाली अर्थव्यवस्था बनकर रह गया था। उस समय भारत की जीडीपी मात्र लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए से कुछ अधिक थी। सदियों के शोषण ने देश को जर्जर कर दिया था, फिर भी राष्ट्र की अंतर्निहित शक्ति ने भारत को पुन: विश्व की सशक्त अर्थव्यवस्थाओं की पंक्ति में ला खड़ा किया।
वर्ष 2025 के अंत में भारत सरकार ने घोषणा की कि देश जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार अब 4.19 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर अर्थात लगभग 380 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। यह उपलब्धि कठोर सुधारों, सशक्त नेतृत्व और भारत को उसकी मूल गौरवपूर्ण स्थिति तक पहुंचाने के दृढ़ संकल्प का प्रारंभिक संकेत है। आने वाले दो-तीन वर्षों में भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद है। यह उपलब्धि तेज आर्थिक वृद्धि, विश्व के तीसरे सबसे बड़े बाजार और विशाल क्रयशक्ति से प्रेरित है, जो बड़े श्रमबल और बढ़ते मध्यम वर्ग से आती है। क्रयशक्ति क्षमता के आधार पर भारत पहले से ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में वह अभी काफी पीछे है, जो करीब 2,900 अमरीकी डॉलर, यानी लगभग 2.6 लाख रुपए वार्षिक आंकी जाती है। देश में अमीर और गरीब के बीच आय की यह खाई गंभीर चुनौती है।
एक बड़ी चुनौती आरबीआइ की उस चेतावनी से उभरती है, जिसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों पर बढ़ते वित्तीय दबाव की ओर ध्यान दिलाया गया है। लोकलुभावन योजनाओं, पेंशन व सब्सिडी, वेतन, ब्याज और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का बोझ लगातार बढ़ रहा है। कुछ राज्यों को तो ब्याज चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। सकारात्मक पहलू यह है कि 2025 के अंत में जारी आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट ने अर्थव्यवस्था को लचीला और बैंकों को मजबूत बताया है। मजबूत घरेलू मांग, नियंत्रित मुद्रास्फीति और कॉर्पोरेट क्षेत्र की सुदृढ़ बैलेंस शीट के सहारे अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। अमरीका भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, हालांकि टैरिफ से जुड़े मुद्दे अभी लंबित हैं और भू-राजनीतिक कारणों से चीन को लेकर भी हाल तक अनिश्चितता बनी रही। इन परिस्थितियों के बावजूद, जुलाई-सितंबर 2025 की तिमाही में अर्थव्यवस्था 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी और पूरे वर्ष के लिए आठ प्रतिशत से अधिक वृद्धि की उम्मीद जगी है। अर्नस्ट एंड यंग, गोल्डमैन सैक्स और प्राइसवाटरहाउसकूपर्स जैसे वैश्विक विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत आगे चलकर अमरीका को पीछे छोड़ते हुए विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। हालांकि समय-सीमा को लेकर मतभेद हैं- क्रय शक्ति के आधार पर यह अवधि 2030-2040 के बीच मानी जाती है, जबकि समग्र रूप से इसमें अभी कई दशक लग सकते हैं। अगले वर्ष भारत स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे करेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वैश्विक आर्थिक संस्थान और घरेलू शक्तिकेंद्र 100 वर्षों की स्वतंत्रता पर भारत को किस रूप में देखते हैं।
ईएंडवाइ के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग छह गुना बढ़कर 26 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। इससे भी अधिक आशावादी अनुमान भारत सरकार के अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के हैं, जो इसे 30-35 ट्रिलियन से लेकर 55 ट्रिलियन डॉलर तक मानते हैं। एक बार फिर भारत को 'सोने की चिडिय़ा' बनाने का सपना कोई कपोल-कल्पना नहीं है। विश्व ने भारत की उभरती आर्थिक शक्ति को स्वीकार कर लिया है। अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सुधारों की निरंतरता बनी रहे, भारत को श्रेष्ठ निवेश गंतव्य बनाया जाए और कृषि की उत्पादकता बढ़े। एक मजबूत और स्थिर सरकार, व्यावहारिक सोच व वित्तीय अनुशासन ही भारत को वैश्विक आर्थिक शिखर तक पहुंचाने की कुंजी होंगे।
Published on:
08 Jan 2026 12:37 pm
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