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अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: विदेशी भाषा की मानसिक गुलामी से मुक्ति जरूरी

International Mother Language Day 2022: हम मातृभाषा के स्थान पर विदेशी भाषा को स्वीकृति दिए हुए एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरे हैं, जो अब भी औपनिवेशिक मानसिकता, मानसिक गुलामी से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सका है। विज्ञान और तकनीक किसी भाषा विशेष और विशेषत: अंग्रेजी में ही हो सकता है। 21 फरवरी इसकी याद दिलाता है कि इस प्रकार की जड़ता से, इस प्रकार की मानसिक गुलामी से हमें हर हालत में मुक्ति चाहिए।

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 International Mother Language Day be free from foreign language slavery

International Mother Language Day be free from foreign language slavery

प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल
(कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)

International Mother Language Day 2022: मातृभाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम और संस्कृति की सजीव संवाहक होती है। यह व्यक्तित्व के निर्माण, विकास और उसकी सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान बनाती है। भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बारे में जागरूकता फैलाने और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर साल 21 फरवरी का दिन दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। बहुभाषिकता भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव है। यहां के अधिकांश जन बहुभाषिक हैं। यहां की भाषाओं में परस्पर संबंध भी है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने स्वयं के अपने अनुभवों के आधार पर एक बार कहा था कि मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी। हमारी नई शिक्षा नीति सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, विकास व उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। दुनिया में हजारों मातृ भाषाएं हैं। सभी प्रकार की बोलियों, उपभाषाओं की गिनती की जाए, तो यह लाखों तक पहुंचती है।

मातृभाषा दिवस पूरी दुनिया में मनाए जाने के ऐतिहासिक कारण हैं। इसके राजनीतिक निहितार्थ हैं, इसके सांस्कृतिक निहितार्थ हैं। इसका मनुष्य की सभ्यता दृष्टि से जुड़ा हुआ अर्थ संदर्भ भी है। आज के संदर्भ में बात की जाए, तो दुनिया के किसी भी राष्ट्र या समाज के आगे बढऩे का रास्ता भी इसी से होकर जाता है।

मातृभाषा किसी भी देश के विकास, शांति, सुख, समृद्धि, वहां के नागरिकों की खुशहाली, सहज वैयक्तिक अंतर्सबंध, सशक्त सामाजिक व्यवस्था इत्यादि के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाती है।

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भारत के साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध से उबरे चीन और जापान के विकास और वहां के नागरिकों के जीवनस्तर, वहां सत्ता और समाज की कार्य निष्पादन क्षमता, राष्ट्रीय विकास में व्यक्ति के योगदान और लगाव इत्यादि की ओर एक सरसरी निगाह डाली जाए, तो भारत से अलग इनमें कोई चीज है तो वह केवल इतना कि उन्होंने बोलना, लिखना, पढऩा, संवाद करना, समाज का संचालन करना और सरकारों का बनना-बिगडऩा ये सब कुछ अपनी भाषा में किया।

विज्ञान की भाषा के रूप में, तकनीक की भाषा के रूप में, न्याय की भाषा के रूप में बाजार और व्यापार की भाषा के रूप में अपनी मातृभाषा को स्वीकृति दी।

ऐसा ही 1949 में उदित हुए राष्ट्र इजरायल ने किया। हिब्रू जैसी लुप्त सी हो गई भाषा, जिसे बमुश्किल कुछ दर्जन लोग जान सकते थे, पढ़ सकते थे, व्यवहार कर सकते थे, उस भाषा को भी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति दे कर इजरायल ने एक चमत्कार किया।

मुझे इस अवसर पर बरबस भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ पंक्तियां याद आती हैं-'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।Ó निज भाषा में व्यवहार करना, मातृभाषा में पढऩा, बोलना, समझना, जानना, बताना और समझाना, यह व्यवहार जिस समाज में होता है, वह समाज उन्नति को प्राप्त करता है और सभी प्रकार की उन्नति, सभी प्रकार के विकास, सभी प्रकार की समृद्धि का मूल यही है।

21 फरवरी 2022 को हम इस बात पर संतोष जरूर व्यक्त कर सकते हैं कि अब भारत के लोगों ने भी मातृभाषा के महत्त्व और उसकी ताकत को समझा है। पहली बार मातृभाषा में शिक्षा को नीतिगत रूप से बल दिया गया है। पहली बार शिक्षा नीति में यह स्वीकार किया गया है कि शिक्षण प्रक्रिया को तेज, परिणामकारी और लक्ष्योन्मुखी बनाने के लिए मातृभाषा से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता।

पहली बार शिक्षा के अंदर भारत की बहुभाषिकता की ताकत की पहचान की गई है। वस्तुत: मातृभाषा न केवल साहित्य, कला, संगीत और संस्कृति से जुड़े हुए जीवन के पक्षों को प्रगल्भ बनाती है, श्रेष्ठ बनाती है, अपितु विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी नव नवोन्मेष, नित नई कल्पनाओं की, संभावनाओं की वृद्धि करती है।

आज भारत की भाषाओं, भारत के जन की मातृ भाषाओं की चर्चा की जाए तो यह संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं तक सीमित नहीं है। अपितु भाषा के रूप में 105 से भी अधिक भाषाएं भारत की ताकत हैं।

इसमें बोलियों, उपबोलियों की चर्चा की जाए, उनकी गणना की जाए तो यह संख्या सात- आठ सौ पहुंचती है। जिसमें किसी न किसी रूप में मनुष्य के शिक्षण का कार्य चलता है।



हम मातृभाषा के स्थान पर विदेशी भाषा को स्वीकृति दिए हुए एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरे हैं, जो अब भी औपनिवेशिक मानसिकता, मानसिक गुलामी से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सका है। विज्ञान और तकनीक किसी भाषा विशेष और विशेषत: अंग्रेजी में ही हो सकता है।

21 फरवरी इसकी याद दिलाता है कि इस प्रकार की जड़ता से, इस प्रकार की मानसिक गुलामी से हमें हर हालत में मुक्ति चाहिए।

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