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सफलता से जरूरी है मुनष्य जीवन को सार्थक करना

नीति पूर्वक, न्याय सहित जीवन हमें सिखाता है कि धन हमारे जीवन के निर्वाह का साधन है, साध्य नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि धन, संपत्ति और उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं है, परन्तु बोधपूर्वक जीना तथा समाज के लिए अपरिहार्य बन कर जीने में ही वास्तविक सफलता और ख़ुशी है। तब यह बोधपूर्ण जीवन केवल मात्र सफल ही नहीं, बल्कि सार्थक भी कहलाएगा। इसलिए सफल जीवन से महत्त्वपूर्ण है सार्थक जीवन तथा सफलता से बढ़ कर है सार्थकता।

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Patrika Desk

May 17, 2023

सफलता से जरूरी है मुनष्य जीवन को सार्थक करना

सफलता से जरूरी है मुनष्य जीवन को सार्थक करना


बिरेन्द्र पाण्डेय
राजभाषा कार्यान्वयन दिग्दर्शिका के लेखक
आइटी सिटी बेंगलूरु में रह रहे एक 58 लाख के पैकेज पाने वाले प्रोफेशनल ने लिखा, 'मैं सभी सुविधाओं में रह रहा हूं, लेकिन मैं अकेला पड़ गया हूं। एक ही तरह की जिंदगी से बोर हो गया हूं। मैं अपनी जिंदगी से खुश नहीं हूं। मैं क्या करूं? कैसे अपनी खुशी हासिल करूं?Ó बेंगलूरु के इंजीनियर की इस बात ने सोशल मीडिया तथा समाचार पत्रों में एक नई बहस शुरू हुई है। सवाल यह है कि जीवन मे सच्ची सफलता क्या है? सफल कौन है? सफलता की परिभाषा क्या है? क्या भौतिक ऐश्वर्य, संसाधनों, धन आदि से परिपूर्ण जीवन ही सफलता का असली मतलब है?
आज का युवा प्रतिभा और क्षमता वाला है। वह सीखने और नई चीजों को तलाशने के लिए उत्सुक है। मुश्किल यह है कि युवा पीढ़ी बहुत जल्दबाजी में है। हालांकि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित, वास्तुकला, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में बहुत प्रगति हुई है, पर हम इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते हैं कि युवा भारत में अवसाद तथा जीवन को लेकर दुविधा की दर में भी समय के साथ काफी वृद्धि हुई है। यह अटल सत्य है कि जिंदगी संघर्षमय है। हमें रोज एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। इस जिंदगी रूपी खेल में जहां हमने एक स्तर पार कर लिया, तो दूसरा स्तर स्वत: तैयार हो जाता है। एक नया संघर्ष, एक नया लक्ष्य फिर तैयार हो जाता है। आज के इस एकल परिवार एवं आर्थिक चुनौतियों से संघर्ष के दौर में सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत खत्म हो रही है। इससे व्यक्ति का जीवन भौतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद आत्मिक सुख-शांति का अनुभव नहीं कर पा रहा है। जीवन का स्वभाव है विस्तार और फैलाव, यह मनुष्य की सारी गति एवं प्रगति का अंतिम लक्ष्य है। अनंत विस्तार को पा जाना, इतना विस्तार कि फिर कुछ भी पाने को शेष नहीं रह जाए। इसलिए मनुष्य एक स्थिति से दूसरी स्थिति की ओर गति करता रहता है और एक दिन समाप्त हो जाता है। क्या भौतिक जगत में उपलब्ध संसाधनों को पाकर व्यक्ति पूर्णत: सुखी हो जाता है? बेंगलूरु के युवा की कहानी को देख कर इसका उत्तर 'नहीं' में ही मिलता है। फिर यह कैसी सफलता है, जहां व्यक्ति की आय से मिलने वाली वाली खुशी क्षणिक और सीमित है। जहां परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों के साथ रह पाना संभव नहीं है। मनुष्य जीवन में आत्माभिव्यक्ति एवं आत्म संतोष के प्रकटीकरण के लिए सामाजिक पूंजी की महती आवश्यकता होती है। सफलता एवं विफलता बहस का विषय है। एक की सफलता दूसरे के लिए असफलता हो सकती है। किसी के लिए 100 रुपए दिन भर में कमाना सफलता हो सकती है, तो किसी दूसरे के लिए दिनभर में लाखों कमाना भी भारी विफलता हो सकती है। किसी को दूसरों की मदद करने, सेवा करने से खुशी मिलती है, तो किसी को दूसरों के जीवन में परेशानी खड़ी करने से खुशी मिलती है।
यह भी कहा जाता है कि 'आपको जो पसंद हो, वह प्राप्त करना' सफलता है। लेकिन भारतीय दर्शन 'व्यक्तिगत खुशी' को सफलता का पैमाना नहीं मानता। वह तो 'आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च' को जीवन का लक्ष्य बताता है। मनुष्य जीवन का पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सूत्र मानकर जीना। धर्म के नियंत्रण में काम एवं अर्थ का उपार्जन करना। यहां पैसा कमाने का निषेध नहीं, पर पैसों के पीछे पागल होने का निषेध है। धर्म का यदि नियंत्रण होगा, तो व्यक्ति अनीति और अन्याय से पैसों का उपार्जन नहीं करेगा। धर्म हमें एक मर्यादा का रास्ता बताता है। नीति पूर्वक, न्याय सहित जीवन हमें सिखाता है कि धन हमारे जीवन के निर्वाह का साधन है, साध्य नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि धन, संपत्ति और उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं है, परन्तु बोधपूर्वक जीना तथा समाज के लिए अपरिहार्य बन कर जीने में ही वास्तविक सफलता और ख़ुशी है। तब यह बोधपूर्ण जीवन केवल मात्र सफल ही नहीं, बल्कि सार्थक भी कहलाएगा। इसलिए सफल जीवन से महत्त्वपूर्ण है सार्थक जीवन तथा सफलता से बढ़ कर है सार्थकता।