
kashmiri youth stone pelting
- मलिक समीद, वरिष्ठ पत्रकार, श्रीनगर से प्रकाशित साप्ताहिक अंग्रेजी समाचार-पत्र ‘द कश्मीर सीनेरियो’ के सीनियर मैनेजिंग एडिटर
कश्मीर में एक के बाद एक आतंकी हमले हो रहे हैं। सीमापर से आतंकवाद को पनाह मिलना छिपा हुआ तथ्य नहीं है। कश्मीर समस्या का हल केवल राजनीतिक तरीके से ही निकाला जा सकता है। बस जरूरत इस बात की है कि कश्मीर की जनता को कैसे जोड़ा जाए। क्योंकि अमन की राह में ही कल्याण निहित है...
जम्मू-कश्मीर और केंद्र सरकार को लोगों में विश्वास बहाल करने का एक तंत्र विकसित करने की जरूरत है जिससे लोगों को पता चल सके कि सही क्या है और गलत क्या है? इससे लोगों को दुष्प्रचार के झांसे में आने से बचाया जा सकेगा।
श्रीनगर एयरपोर्ट के नजदीक सीमा सुरक्षा बल(बीएसएफ) के कैंप पर हुआ आतंकी हमला कश्मीर में जारी हिंसा की ही एक कड़ी है। कश्मीर के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ऐसे हमले मानवता को शर्मसार करते हैं। राजनीतिक समस्या का हल नहीं हो पाने का असर जनता को झेलना पड़ता है। आतंकवादियों और सुरक्षा बलों की तरफ से होने वाली कार्रवाई में जनता पिसती है। कश्मीर समस्या का बातचीत के जरिए राजनीतिक समाधान निकाला जाना चाहिए।
दरअसल, समस्या यह है कि इस चीज पर सही से ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि हमले क्यों हो रहे हैं और इनका समाधान क्या है? हमें इस चीज पर गौर करने की जरूरत है कि युवाओं के दिमाग में आखिर ऐसा क्या है कि वो हमले भी कर रहे हैं और जान भी दे रहे हैं? सीमा पर सुरक्षा-व्यवस्था इतनी मजबूत होने के बाद भी आतंकी सीमा पार कैसे कर रहे हैं? कश्मीर में यह सवाल बहुत उठ रहा कि ये आतंकी कैसे सीमा पर कर रहे हैं और इनको पनाह कौन दे रहा है और इतनी सुरक्षा व्यवस्था वाली जगहों पर ये कैसे हमले कर रहे हैं? कश्मीर में चल रही हिंसा में सुरक्षा बलों और कश्मीरियों, दोनों तरफ से जान जा रही हैं।
जान गंवाने वालों के परिवार का दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जो इसका भुक्तभोगी रहा हो। कश्मीर की जमीनी स्थिति की बात की जाए तो यहां पाकिस्तान का प्रभाव कम हुआ है। अब यहां पाकिस्तान के समर्थन के नारे न लगकर आजादी के अधिक लग रहे हैं। कश्मीर के आधे से अधिक लोगों को पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीतिक हालात की जानकारी नहीं है, उनको सिर्फ यही लगता है कि पाकिस्तान उनका समर्थन कर रहा है। लोगों के दिमाग में यह बात बैठा दी गई है कि उन्हें पाकिस्तान का समर्थन मिला हुआ है और ऐसे हमलों में भारतीय एजेंसियों का हाथ होता है।
जम्मू-कश्मीर और केंद्र सरकार को लोगों में विश्वास बहाल करने का एक तंत्र विकसित करने की जरूरत है जिससे लोगों को पता चल सके कि सही क्या है और गलत क्या है? इससे लोगों को दुष्प्रचार के झांसे में आने से बचाया जा सकेगा। कश्मीर के लोग देश के अन्य भाग में होने वाली पुलिस या सुरक्षा बलों की तुलना कश्मीर की कार्रवाई से करते हैं। कुछ समय पहले राम रहीम को सजा के बाद हुई हिंसा के बाद यहां सवाल उठा कि वहां पर पैलेट गन का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? सरकार दावा करती रही है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद कश्मीर में आतंकी हमलों में कमी आई है और आतंकी सरहद पार नहीं कर पा रहे हैं। पर हाल ही में सेना और पुलिस ने दावा किया है कि उत्तरी कश्मीर में ८०-८२ विदेशी आतंकी मौजूद हैं। सेना और पुलिस का यह दावा सरकार के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
जम्मू-कश्मीर चुनाव के दौरान पीडीपी के बयानों को देखा जाए तो उसने भाजपा की जमकर आलोचना की थी पर चुनाव के बाद भाजपा से गठबंधन करके सरकार बना ली। इससे कश्मीर की जनता में नकारात्मक संदेश गया क्योंकि घाटी के लोगों का भाजपा को समर्थन नहीं है। गठबंधन की सरकार बनने से लोगों में नाराजगी की भावना बढ़ रही थी और बुरहान वानी की मौत ने इस आग में घी का काम किया। इसके बाद कश्मीर में हिंसा बढ़ती ही चली गई। हालात यह हो चले हैं कि अब तक लगभग ३४५ स्थानीय आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन के साथ जुड़ चुके हैं और कश्मीर में हिंसा फैला रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल रहे लोगों पर बड़ी संख्या में पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) लगाया है। इसमें बहुत से नाबालिग भी हैं। कई मामलों में तो १३-१४ साल के लडक़े भी हैं। इन लडक़ों का जेल में आसानी से ब्रेनवाश हो जाता है। जेल से बाहर आने के बाद ऐसे बहुत से लडक़े हिजबुल और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। यदि हम उदाहरण देखें तो अभी हिजबुल का ‘ए’ ग्रेड का कमांडर जुबैर भी कभी पत्थरबाज ही था जिस पर बार-बार पीएसए लगाकर ४ साल तक जेल में रखा गया। बाद में वह पेशी के दौरान कोर्ट से भाग गया और आतंकी बन गया।
राज्य सरकार को इस दिशा में सोचने की जरूरत है कि नाबालिगों पर पीएसए लगाने की बजाए उनकी काउंसिलिंग हो। कई बार नाबालिग बच्चे बहकावे में आ जाते हैं तो उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए। पीएसए लगाने के बाद जब उनका ब्रेनवाश हो जाता है तो उनके सुधरने की संभावना कम बचती है और वे आतंक की तरफ अग्रसर हो जाता है। सरकार को लोगों में विश्वास बनाने की जरूरत है। कश्मीर में प्रतिनिधिमंडल तो आते रहते हैं पर वो मिलते किससे हैं? यहां जनता की प्रतिनिधि होने का दावा हुर्रियत करती रही है।
कुछ समय पहले केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह राज्य के दौरे पर आए थे तो उन्होंने कहा कि कोई भी मुझसे मिल सकता है। उनसे मिलने के लिए कुछ पत्रकारों को बुलाया गया जो अधिकतर पहले से ही पार्टीलाइन से जुड़े रहे हैं। इसमें भी उन पत्रकारों की अनदेखी की गई जो जिन्हें जमीनी हकीकत पता है। उम्मीद थी कि नतीजा निकलेगा पर हुआ कुछ नहीं। अधिकतर कश्मीरी, भारत से अलग नहीं होना चाहते, वे चाहते हैं कि समस्या का समाधान हो और अमन कायम हो।

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