
Leadership
प्रो. हिमांशु राय
(निदेशक, आइआइएम इंदौर)
हमने पिछले सप्ताह नियंत्रण के लिए रुझान, स्पर्धा और ऊर्जा के उपयोग के बारे में चर्चा की। नियंत्रण और विरोधाभास से संबंधित विषय पर भारतीय शास्त्र और ग्रंथों ने परिष्कार और प्रतिभा के बारे में समझाने के लिए सुंदर रूपकों का उपयोग किया है। ये रूपक सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं और कर्म योग का निर्धारण समाधान प्रदान करता है। पुराणों के अनुसार, ब्रह्माण्ड की रचना कर ब्रह्मा इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अपनी रचना को निहारने के लिए एक और सिर उत्पन्न कर लिया। उन्होंने इस रचना को स्वयं की क्षमता और महत्त्व से जोड़ लिया। भगवान शिव को संभावित परिणाम का अनुमान था, अत: उन्होंने ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया, ताकि वह समझ सकें कि उन्हें अपनी रचना से इतना लगाव नहीं होना चाहिए। यहां पांचवें सिर का कटना एक रूपक है।
हम सब ब्रह्मा की ही भांति, अपनी स्थिरता (मानसिक स्थान के लिए एक रूपक) सुनिश्चित करने के लिए अपने जीवन के विभिन्न बाहरी पहलुओं जैसे रिश्तों, संघों, संपत्ति, नियमों आदि का एक व्यक्तिगत सूक्ष्म-ब्रह्माण्ड बनाते हैं। लेकिन जल्द ही, हम बाहरी ब्रह्माण्ड में हमारी व्यवस्था, प्रबंधन और प्रशासन सुनिश्चित करने के कार्य में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि हम अपनी पहचान और मूल्य को इससे जोड़ लेते हैं। यह हमें कमजोर बनाता है, और हर अवांछित परिवर्तन, चुनौती या खतरा प्रतीत होता है।
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जब हम स्वयं की छवि को अपनी रचना या अपने बाहरी व्यक्तिगत ब्रह्माण्ड से जोड़ते हैं, तो उस ब्रह्माण्ड में अपना महत्त्व व व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए मजबूर महसूस करते हैं। हम अपने ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए पूर्वाग्रह, अस्वीकृति और पक्षपात के किले या 'दुर्ग' बनाते हैं और स्वयं की छवि की रक्षा के लिए स्थिरता सुनिश्चित करते हैं। ये दुर्ग व्यापक परिवर्तन और रचनात्मकता में बाधा साबित होते हैं। देवी आदि-पराशक्ति दो पूरक रूप लेती हैं, दुर्गा और शक्ति।
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दुर्गा, दुर्ग-विनाशिनी हैं और किसी की पहचान को सृजन से अलग करने व आत्म-पक्षपात को नष्ट करने के लिए आवश्यक स्वीकृति और सतर्कता की बाहरी शक्ति को दर्शाती है, जो मानसिक शक्ति का स्वरूप है। देवी शक्ति इसी शक्ति के स्रोत के रूप में कार्य करती है क्योंकि यह व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और जागरूकता का प्रतीक है। इसलिए, देवी दुर्गा अवलोकन और ध्यान की एक बाहरी शक्ति हैं और देवी शक्ति आंतरिक शक्ति हैं।
यह शक्ति योग के सबसे विचारशील और प्रबुद्ध रूप 'कर्म योग' के अभ्यास से जागृत की जा सकती है। इससे व्यक्ति वास्तविक पहचान और आत्म-मूल्य की खोज कर सकता है। योगीराज कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अपने प्रवचन में अर्जुन को प्रबुद्ध किया। यह हमें बताता है कि हमें कर्म करने का अधिकार है लेकिन उस कर्म के फल पर नहीं। यह सब कुछ नियंत्रित करने के व्यर्थ प्रयासों को छोड़ कर कत्र्तव्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करता है। कर्म योग के लिए अत्यधिक अभ्यास व आत्म-संयम की आवश्यकता होती है, पर प्रारंभिक तौर पर जागरूकता (स्थान) और सतर्कता (ध्यान) का अभ्यास निर्धारित किया जाता है।
Published on:
07 Feb 2022 12:06 pm
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