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कला और संस्कृति के उजास के संवाहक बनें हम

कलाएं काल के अनन्तर अपना अलग समय गढ़ती हैं। व्यक्ति में देखने, विचारने, चीजों और समय को परखने की दीठ कहीं से मिलती है, तो कलाओं से ही मिलती है। बल्कि कहूं, कलाओं का प्रभाव सूक्ष्म, अस्पष्ट होता है, पर सर्वव्यापी होता है। इसलिए यह जरूरी है, कुछ ऐसे प्रयास निरन्तर हों, जिनके आलोक में हम सही मायने में सांस्कृतिक हो सकें। ऐसे, जिनसे जीवन में उत्सवधर्मिता बनी रहे।

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Patrika Desk

Jan 01, 2023

कला और संस्कृति के उजास के संवाहक बनें हम

कला और संस्कृति के उजास के संवाहक बनें हम

राजेश
कुमार व्यास
कला समीक्षक

वर्ष आज बीत रहा है। कल नए वर्ष का सूर्य उदित होगा। कैलेंडर बदल जाएगा। सब कुछ नया होगा। आइए , बीते वक्त की तमाम कड़वाहटों को भुलाते साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि कलाओं में रमें। मूल्य-मूढ़ होते जा रहे इस समय में बचेगा वही, जो रचेगा।
कलाएं काल के अनन्तर अपना अलग समय गढ़ती हैं। व्यक्ति में देखने, विचारने, चीजों और समय को परखने की दीठ कहीं से मिलती है, तो कलाओं से ही मिलती है। बल्कि कहूं, कलाओं का प्रभाव सूक्ष्म, अस्पष्ट होता है, पर सर्वव्यापी होता है। इसलिए यह जरूरी है, कुछ ऐसे प्रयास निरन्तर हों, जिनके आलोक में हम सही मायने में सांस्कृतिक हो सकें। ऐसे, जिनसे जीवन में उत्सवधर्मिता बनी रहे।
संयोग देखिए, कलाओं के समय को अनुभूत करते ही आप सबसे यह संवाद यहां हो रहा है। कलाकार दम्पती विनय-सुप्रिया अम्बर के वैयक्तिक प्रयासों से सात वर्षों से आयोजित हो रहे जबलपुर आर्ट लिटरेचर एंड म्यूजिक फेस्टिवल में था। अनुभूत हुआ बाजारवाद में छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों में अब भी कुछ उजास बचा है। वहीं एक सांझ धानी गुंदेचा के धुव्रपद गान की थी। वह गा रही थीं, 'महाकाल महादेव धूर्जटी शुलपंचवादन प्रसन्न नेत्र महाकाल...'। लगा समाधिस्थ शिव की अर्चना में जतन से शब्द सहेज वह स्वरों की जैसे माला पिरो रही थीं। झंकृत स्वर। एक में मिलता दूसरा..तीसरा। स्वरों का ओज, गूंज। नव वर्ष का यह जैसे माधुर्य आगाज था। कैनवस पर रंग-रेखाएं सज रही थीं। मूर्ति शिल्प, संस्थापन में मन नहा रहा था। छाया चित्र, कार्टून प्रदर्शनी गुदगुदा रही थी, तो सभागार में कला-विमर्श से भविष्य की नई राहों की आस जग रही थी। सच में यह संस्कृति से जुड़ा मन को रंजित करता कला पर्व था। सांस्कृतिक विमर्श में कलाओं की भूमिका पर जब बोल रहा था, तो कहा भी कि इस तरह के स्वतंत्र आयोजन संस्कृति से जुड़े संस्कारों में निवेश हैं। संस्कृति क्या है? जीवन जीने का ढंग ही तो है। कलाएं संस्कृति का बहुत बड़ा हिस्सा हैं। अज्ञेय ने कभी वत्सल निधि की स्थापना और लेखक यात्राओं की पहल इसलिए की कि साहित्य-संस्कृति से जुड़े अतीत से हम पुनर्नवा हों। मुझे लगता है कि जबलपुर लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल इसी कड़ी में बढ़त है। बाजारवाद की शक्तियों से जुड़े मेलों के रेलों के मध्य जलता एक नन्हा सा दीप। ढेर सारी रोशनी सहेजे उजास का संवाहक।
ब.व. कारन्त को एक शिष्य ने अपनी समस्या बताई, इतने बरस हो गए नाटक करते पर प्रसिद्धि नहीं मिली। कारन्त ने ब्लैक बोर्ड पर लिखा, प्रसिद्धि। कहा, थोड़े प्रयासों से बहुत आसान है, यह प्राप्त करना। फिर 'प्र' हटा दिया। बोले यह जो सिद्धि है, वह प्राप्त करना जरूरी है। कर ली तो फिर प्रसिद्धि की अपेक्षा ही नहीं रहेगी।...तो आइए, नए वर्ष में हम सिद्ध होने की ओर अग्रसर हों। साहित्य, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र कलाओं के ऐसे आयोजनों से ही तो समृद्ध-सम्पन्न होता है समाज। सबके लिए नई उम्मीदें, आशाएं लिए आगामी वर्ष भी ऐसे ही मंगलमय होता रहे।

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