लॉकडाउन और घरेलू हिंसा

लॉकडाउन के दौर में घरेलू हिंसा के जो आंकड़े सामने आए हैं वे भी वास्तविकता से परे हो सकते हैं। ज्यादातर मामलों में पीड़ित महिलाएं बाहर नहीं निकल पाने की मजबूरी के कारण अपनी शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाई होंगी। इन्हें त्वरित न्याय की जरुरत है।

By: Prashant Jha

Updated: 28 May 2020, 03:06 PM IST

डॉ. मुक्ति जायसवाल, निजी विवि में अध्यापन

एक तरफ कोरोना को लेकर चारों तरफ भय का माहौल है वहीँ लम्बे लॉक डाउन के दौरान महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा के बढे मामलों ने नई किस्म की चिंता की ओर ध्यान दिलाने की जरुरत महसूस की है. पहले दो- तीन चरणों में तो लॉक डाउन के दौरान विशेष परिस्थतियों में ही घरों से बाहर आने की अनुमति थी। ऐसे में, जहा परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहे जिनके बीच चाहे मधुर सम्बन्ध हो या न हो. ,ऐसे में यह जानना अहम् होगा कि वे जब सम्बन्ध मधुर नही है तो कैसे एक दूसरे के साथ सामंजस्य बैठा रहे होंगे।

अगर हम राष्ट्रीय महिला आयोग की माने तो देशव्यापी बंद से पहले और बाद के 25 दिनों में विभिन्न शहरों से मिली शिकायतों के आधार पर महिला आयोग ने यह दावा किया है महिलाओं से घरेलू हिंसा के मामले लगभग दोगुने बढ़ गए हैं । आयोग ने इस साल 27 फरवरी से 22 मार्च के बीच और लॉकडाउन के दौरान 23 मार्च से 16 अप्रैल के बीच मिली शिकायतों की तुलना के बाद आंकड़े जारी किए हैं । यह बता दें कि महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिसके साथ महिला के पारिवारिक सम्बन्ध हैं, घरेलू हिंसा में शामिल है। कभी कभी प्रश्न उठाया जाता है कि पीड़ित कौन है ? अर्थात इस अधिनियम के अंतर्गत घरेलू महिला में कौन शामिल है | इसका सीधा सा जवाब यह है कि इसका लाभ केवल और केवल महिलाओ को है और ऐसी महिला किसी के साथ, चाहे वो पुरुष हो या अन्य महिला, एक ही छत के निचे निवास करती हो | इस अधिनियम के लागू होने की यह आवश्यक शर्त और भी है कि पीड़ित महिला जिसके साथ निवास कर रही है, उसके साथ घरेलु नातेदारी अवश्य होनी चाहिए | इसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्बन्ध आते है -
रक्तजनित सम्बन्ध (जैसे माँ- बेटा, पिता- पुत्री, भाई- बहन, इत्यादि)
विवाहजनित सम्बन्ध (जैसेपति-पत्नी,सास-बहू,ससुर-बहू, देवर-भाभी, ननद परिवार, विधवाओं के सम्बन्ध या विधवा के परिवार के अन्य सदस्यों से सम्बन्ध)
दत्तकग्रहण/गोदलेने से उपजे सम्बन्ध (जैसे गोद ली हुई बेटी और पिता)

अगर हम लॉक डाउन के दौरान आकड़ो पर नजर डाले तो आयोग के अनुसार आकड़ो में दोगुना इजाफा हुआ है। इसके मुताबिक, बंद से पहले आयोग को घरेलू हिंसा की 123 शिकायतें मिली थीं जबकि लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन व अन्य माध्यम से घरेलू उत्पीड़न के 239 मामले दर्ज कराए गये।

लॉकडाउन से पहले के 25 दिनों में 117 महिलाओं ने भेदभाव का आरोप लगाया। वहीं, लॉकडाउन के दौरान 166 महिलाओं/युवतियों ने समाज व परिवार में सम्मान के साथ जीने का व अधिकार दिलाने की बात कही । इसी तरह साइबर अपराध के भी जहां पहले 396 मामले आए वहीं बाद में 587 शिकायतें मिलीं । लेकिन सकारात्मक बात यह रही कि दहेज उत्पीड़न के मामले घटे | आयोग के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान दहेज उत्पीड़न के मामलों में गिरावट आई है । लॉकडाउन से पहले के 25 दिनों में 44 शिकायते दहेज़ से सम्बंधित मिली थीं । जबकि लॉकडाउन के दौरान 37 मामले सामने आए । इसी तरह पहले 25 दिनों में छेड़खानी के 25 मामले सामने आए जबकि लॉकडाउन के दौरान 15 शिकायतें मिलीं । लेकिन यह आकडे क्या वास्तविकता को बयान करते है ? इसमें संदेह है | क्योकि लॉक डाउन में जहां व्यक्ति को बाहर निकलने पर पाबन्दी है वहाँ वह अपनी शिकायत भी नही लिखवा पा रहा है जिससे दोषी व्यक्ति पर अंकुश लगाया जा सके |

लॉकडाउन के तहत पीड़ितों के लिए शिकायत दर्ज कराने के सिर्फ तीन तरीके हैं - पहला सोशल मीडिया, दूसरा ईमेल और तीसरा ऑनलाइन पंजीकरण | राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के 69 मामले, गरिमा के साथ जीने के 77 मामले, विवाहित महिलाओं की प्रताड़ना के 15 मामले, दहेज की वजह से हत्याओं के दो मामले, बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के 13 मामले दर्ज हुए हैं | घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की सर्वाधिक 90 शिकायतें उत्तर प्रदेश से आई हैं | दिल्ली से 37, बिहार से 18, मध्य प्रदेश से 11 और महाराष्ट्र से 18 शिकायतें आई हैं | लॉकडाउन से पहले उत्तर प्रदेश से समान अवधि में 36, दिल्ली से 16, बिहार से आठ, मध्य प्रदेश से चार और महाराष्ट्र से पांच शिकायतें दर्ज हुई थीं |
यह आकडे अपने आपमें बयां कर रहे है कि लॉक डाउन के दौरान घरेलु हिंसा के मामले में वृद्धि हुयी है | इसका कारण भी समझा जा सकता है | लॉक डाउन के दौरान पीडिता हिंसा करने वाले के साथ रहने को मजबूर है | वो बाहर निकल नहीं सकती और उसे ता है कि अगर वह अपने मायके या किसी अन्य रिश्तेदार के यहाँ जाना भी चाहे तो उसे वहा पहुचने से पहले चौदह दिन किसी अन्यत्र जगह पर प्रशासन द्वारा क्वारनटाइन रखा जायेगा | ऐसे में वह घरेलू हिंसा को बर्दास्त करना ज्यादा बेहतर समझ रही है | इस सम्बन्ध में मैंने आसपास के कुछ गृहणियों से भी बात की जिसके सम्बन्ध में उनका कहना था कि सरकार का इस सम्बन्ध में अलग व्यवहार होना चाहिए | अगर कोई घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला या युवती है और वो अपने मायके या किसी अन्य रिश्तेदार के यहाँ जाना चाहती है तो प्रशासन द्वारा उसकी मदद किये जाने की आवश्यकता है | अगर उस महिला को उसके वांछित जगह के बजाय क्वारनटाईन रखा जाता है तो उसके लिए यह घरेलु हिंसा से बढ़कर होगा और हो सकता है कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाय या कोई गलत कदम उठा ले | हालाँकि राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक व्हाट्सएप नंबर जारी किया है, जिस पर लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की शिकायतें दर्ज़ कराई जा सकेंगी । लॉकडाउन के कारण घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज़ ना करवा पाने वाली महिलाएं 7217735372 पर व्हाट्सएप मैसेज कर अपनी शिकायत दर्ज़ करवा सकती हैं। आयोग ने ट्वीट के माध्यम से यह जानकारी दी कि लॉकडाउन के बाद से घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाएं अब अपनी शिकायत भेज सकती हैं, जिससे एजेंसी से उन महिलाओं को सहायता उपलब्ध करवाई जा सके।

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