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दुनिया के प्रथम मैनेजमेंट गुरु हैं भगवान गणेश

आस्था के आकार और धर्म के धरातल पर भारतीय संस्कृति में गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा गया है। इसके साथ ही प्रबंधन के प्रेरणा स्रोत के रूप में वे विश्व के मौलिक मैनेजमेंट गुरु तो हैं ही, प्रथम प्रबंधशास्त्री भी हैं। देखा जाए, तो गणेश प्रबंधन का संस्कार भी है, व्यवहार भी है, तो नवाचार भी। दूसरे शब्दों में कहें तो वे प्रबंधन के पुरोधा हैं। उनमें एक मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रशासनिक दक्षता और प्रबंधकीय क्षमता का समन्वित स्वरूप है।

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Patrika Desk

Aug 31, 2022

दुनिया के प्रथम मैनेजमेंट गुरु हैं भगवान गणेश

दुनिया के प्रथम मैनेजमेंट गुरु हैं भगवान गणेश

अजहर हाशमी
प्रसिद्ध कवि और गीतकार

आस्था के आकार और धर्म के धरातल पर भारतीय संस्कृति में गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा गया है। इसके साथ ही प्रबंधन के प्रेरणा स्रोत के रूप में वे विश्व के मौलिक मैनेजमेंट गुरु तो हैं ही, प्रथम प्रबंधशास्त्री भी हैं। देखा जाए, तो गणेश प्रबंधन का संस्कार भी है, व्यवहार भी है, तो नवाचार भी। दूसरे शब्दों में कहें तो वे प्रबंधन के पुरोधा हैं। उनमें एक मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रशासनिक दक्षता और प्रबंधकीय क्षमता का समन्वित स्वरूप है। अर्थात वे कुशल प्रशासक भी हैं, तो प्रखर प्रबंधक भी। पहले हम यह समझ लें कि एक मैनेजमेंट गुरु की प्रमुख रूप से पांच विशेषताएं होती हैं। ये हैं- संस्कारशीलता, व्यवहार कुशलता, संस्थान की हित साधना, त्वरित और औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता और नवाचार के प्रति उत्साह। मेरा मत है कि इन पांचों गुणों की कसौटी पर गणेश विश्व के पहले मैनेजमेंट गुरु सिद्ध होते हैं। संस्कारशीलता के संदर्भ में देखें, तो उनमें साहस और समर्पण के संस्कार कूट-कूट कर भरे हुए हैं। एक मैनेजमेंट गुरु के लिए कठिनाइयों से लोहा लेने का साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संस्कार अनिवार्य है।
गणेशजी की संस्कारशीलता अर्थात साहस और समर्पण का प्रमाण उन्होंने कई मौकों पर दिया है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि जब भगवान शिव ने यह उत्तरदायित्व गणेशजी को सौंपा कि उन्हें (शिव को) विश्राम के समय कोई व्यवधान नहीं पहुंचाए तो वे 'रक्षा प्रबंधकÓ के रूप में द्वार पर खड़े हो गए। किसी जरूरी कार्यवश जब परशुरामजी भगवान शंकर से मिलने आए, तो गणेशजी ने उन्हें रोक दिया। यह द्वार के 'रक्षाप्रबंधकÓ के रूप में कर्तव्यपालना का उदाहरण था। इस पर क्रोधित हुए परशुराम ने गणेश को युद्ध के लिए ललकारा। उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा तथा साहसपूर्वक परशुराम जी से युद्ध किया। कथा है कि इस युद्ध में गणेशजी के एक दांत का क्षय भी हुआ, जिसके कारण वे 'एकदंतÓ कहलाए। दोनों के बीच युद्ध के शोरगुल से भगवान शिव की नींद खुल गई और उन्होंने दोनों को रोका। साथ ही गणेशजी को उनके साहस और समर्पण यानी कर्तव्यनिष्ठा के लिए आशीर्वाद दिए। तात्पर्य यह है कि मैनेजमेंट गुरु की प्रथम विशेषता अर्थात् साहस और समर्पण से गणेशजी संपन्न हैं। जहां तक व्यवहार कुशलता का बिंदु है, तो गणेशजी यहां भी विश्व के प्रथम मैनेजमेंट गुरु सिद्ध हो रहे हैं। उदाहरणार्थ दूर्वा (दूब या एक प्रकार की घास) और मोदक (लडï्डू) दोनों के प्रति उनका व्यवहार समान है। पूजन में दूर्वा तो भोग में लडï्डू। इसे कहते हैं समता का व्यवहार। एक हाथ में 'फरसाÓ यानी शक्तिशाली अस्त्र को जितना सम्मान देते हैं, तो दूसरी ओर अपने वाहन के रूप में अंगीकार करके मामूली मूषक (चूहा) को भी उतना ही मान देते हैं। यदि संस्थान की हित साधना के आधार पर देखें, तो भले ही यह क्षेपक हो किंतु उदाहरण तो है कि जब पार्वतीजी स्नान के लिए गईं और किसी को भी प्रवेश नहीं देने का कहकर गणेशजी को द्वारपाल का मैनेजमेंट सौंप दिया तो पार्वती यानी संस्थान के हित में गणेशजी ने भगवान शिव को भी प्रवेश नहीं करने दिया। भले ही क्रोध में भगवान शिव ने गणेशजी का मस्तक काट दिया हो।
तात्पर्य यह कि त्याग से ही संस्थान की हित साधना मैनेजर/मैनेजमेंट गुरु करता है। गणेशजी ने यही किया। मैनेजमेंट गुरु के रूप में देवताओं की प्रतिस्पर्धा (आधुनिक समय में अन्य संस्थानों के साथ स्पर्धा) में प्रथम आने के लिए 'श्रीरामÓ लिखकर और माता-पिता (शिव-पार्वती) की परिक्रमा करके त्वरित और औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता का परिचय दिया। जहां तक नवाचार के प्रति उत्साह का मामला है तो महाभारत लेखन के समय वेदव्यास द्वारा दी गई कलम टूट जाने पर गणेशजी ने अपने दांत से लेखन करके महाभारत ग्रंथ को पूर्ण किया। सिद्ध हुआ कि प्रथम मैनेजमेंट गुरु हैं गणेशजी।