
PM Narendra Modi
डॉलर के मुकाबले रुपए का अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंचना देश की आर्थिक सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। महंगाई के बोझ से पस्त आम आदमी के लिए रुपए का कमजोर होना और दर्दनाक साबित होगा। बीते चार साल में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत छह रुपए गिरी है। जाहिर है तात्कालिक कारण अमरीका का चीन और यूरोपीय यूनियन के साथ चल रहा ‘व्यापारिक युद्ध’ हो सकता है। लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल भी इसका बड़ा कारण माना जा सकता है।
वैश्विक उथल-पुथल के चलते यों तो समूची एशियाई करेंसी कमजोर हुई हैं, लेकिन इसका सर्वाधिक असर हमारे खाते में ही आया है। रुपया एक साल में लगभग आठ फीसदी धराशायी हुआ है। हमारे पास फिलहाल ४१० अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और हमारी के्रडिट रेटिंग भी स्थिर है। लेकिन दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है उसमें परेशानी और बढऩे की आशंका जताई जा रही है। ऐसा हुआ तो रोजमर्रा की अनेक वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे। ये खतरे की घंटी है। हमारे लिए अहम सवाल ये है कि इससे निपटने के लिए क्या किया जाए?
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले प्रचार अभियान के दौरान डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपए को लेकर नरेन्द्र मोदी कांग्रेस का खासा मजाक उड़ाया करते थे। मोदी कहते थे कि जब देश आजाद हुआ तो एक रुपया एक डॉलर के मुकाबले था। लेकिन कांग्रेस की गलत नीतियों के चलते रुपया कमजोर होता चला गया। भाजपा को शासन करते चार साल से अधिक हो गए हैं। जनता जानना चाहती है कि आखिर रुपया अब मजबूत क्यों नहीं हो रहा? इस साल अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों से बड़ी रकम निकाल चुके हैं।
वैश्विक व्यापार युद्ध के दौर में चीन और यूरोपीय यूनियन भी अमरीकी चालों का जवाब देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इससे आर्थिक उठापटक बढऩे के आसार हैं। ऐसे में हमें निर्यात को बढ़ाने के लिए आयात को कम करने की दिशा में ठोस रणनीति तैयार करनी होगी ताकि अधिक डॉलर खर्च नहीं करने पड़ें। कच्चे तेल के विकल्पों पर भी गम्भीरता से ध्यान देना होगा। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद देश की अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर चुकी है। अब उम्मीद थी कि ‘अच्छे दिन’ आएंगे। लेकिन डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया नए खतरों का अहसास करा रहा है। सरकार को इससे निपटने की दिशा में कारगर योजना तैयार करनी चाहिए।

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