
अर्जुन के मन में एक विचित्र प्रकार की वितृष्णा जागी। क्या रखा था इन बातों में? वे लोग अपने जीवन का एक बड़ा भाग जी चुके हैं। अब शेष बचा ही कितना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वाद्र्धक्य के कारण उन लोगों का अपने मन पर नियंत्रण शिथिल हो रहा है? लोभ और तृष्णा को उन्होंने अपने यौवन काल में तो दबाए रखा अब वे भाव उनकी क्षमता को चुनौती देते हुए उद्दंड हो रहे हैं।
वह न भी हो तो क्या वृद्धावस्था के कारण उनका मस्तिष्क विकृत हो रहा है। उनसे निर्णय की भूल हो रही है? वे नहीं समझ पा रहे हैं कि वे लोग क्या कर रहे हैं। भीम ने तो कभी समर्थन नहीं किया अर्जुन की नीति का। उसने कहा कि वे लोग क्षत्रिय कर्म कर रहे हैं, इसलिए अर्जुन उन्हें मुनियों का-सा उपदेश न दे। भीम सदा से ऐसा ही रहा है।
वह बहुत भिन्न है, अर्जुन से। वह धर्मराज से भी भिन्न है। वह अर्जुन को कहता है कि अर्जुन एक समर्थ क्षत्रिय होकर भी मूर्खों के समान बातें कर रहा है। रजोगुण बहुत है भीम में? क्यों? उसने भी तो वही शिक्षा प्राप्त की है, अपने गुरुओं से। पर नहीं। लोग शिक्षा प्राप्त तो करते हैं, किंतु उसे ग्रहण नहीं करते। और शिक्षा से ही तो सब कुछ नहीं होता, नहीं तो अच्छी शिक्षा से संसार में सब कुछ सुधर जाता।
शिक्षा तो दुर्योधन ने भी वही पाई है, पर उसके व्यवहार में शिक्षित मनुष्य का कोई भी गुण है क्या? शिक्षा से लोकमत तो बनेगा, किंतु उससे प्रत्येक मनुष्य में इच्छित गुण उत्पन्न नहीं होंगे। गुण तो जन्मजात ही हैं- ईश्वर प्रदत्त पूर्व जन्मों के कर्मों और संस्कारों के अनुरूप।कृष्ण ने युद्धारंभ के समय ही उससे दैवी और आसुरी संपदा की चर्चा की थी।
उन्होंने कहा था, भय, क्रोध, द्वेष, लोभ तथा सम्मान पाने की लालसा का अभाव, अंत:करण की निर्मलता, दिव्य ज्ञान का सेवन, दान, यज्ञ, वेदों का अध्ययन, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, त्याग, शांति, दया, कोमलता, लज्जा, दृढ़ निश्चय, तेज, क्षमा, धैर्य तथा पवित्रता- ये सब गुण दैवी प्रकृति के लक्षण हैं।
मध्यम पांडव भीम इन सबसे अछूता तो नहीं है। भय का सर्वथा अभाव है उसमें। किसी बात का भय नहीं है उसको। पर क्रोध का अभाव नहीं है उसमें। वह क्रोध चाहे सात्विक ही हो, किंतु क्रोध तो है ही। सब समय वह सात्विक भी नहीं होता, कभी-कभी अपने बल के अहंकार से भी जन्मता है तब भीम को रोकना कठिन हो जाता है।
द्यूतसभा में द्रौपदी को अपमानित होते देखकर भीम का क्रोध सर्वथा उच्छृंखल हो गया था। वह धर्मराज के हाथों को जलाने की बात कह उठा था। पर लोभी नहीं है वह। हां! सांसारिक भोग की इच्छा उसमें अपने दूसरे भाइयों से कुछ अधिक है। रजोगुण का बाहुल्य है उसमें। उसके अंत:करण की निर्मलता पर अर्जुन को कभी संदेह नहीं हुआ। वह सरल भी है।
कई बार तो लगता है कि बहुत भोला है, बहुत अबोध है। इसीलिए अर्जुन के मन में बहुत प्रेम है, अपने उस उद्दंड भाई के लिए। उसमें सत्य, दया और कोमलता भी है, किंतु वह कठोर और हिंस्र भी हो उठता है। नहीं! शायद वह हिंस्र नहीं है, किंतु प्रतिशोध की भावना भयंकर है उसमें। उसका प्रतिशोध और दंड बड़ा कठोर होता है।
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