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सच साबित हुई पश्चिमी सभ्यता से जुड़ी महात्मा गांधी की आशंका

- महात्मा गांधी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि यूरोप और अमरीका की आधुनिक सभ्यता मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं है। - इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में लंबा समय गुजारने वाले गांधीजी ने 40 साल की उम्र में 1909 में 'हिन्द स्वराज' लिखते हुए पश्चिम की सभ्यता का जो खाका खींचा था, वह अब क्रूर सच्चाई बन कर सामने आ रहा है।

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Mahatma Gandhi Jayanti

सच साबित हुई पश्चिमी सभ्यता से जुड़ी महात्मा गांधी की आशंका

गिरीश्वर मिश्र, (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

हिंसा, अविश्वास और आत्मश्लाघा के तीव्र उफान के दौर में आज हर किसी को उस राह की दरकार है, जिस पर चल कर शांति, सुख और समृद्धि मिल सके। बाजार और भौतिकता की लम्बी और घनी छाया के बीच अपने अलावा अब कुछ और सूझ ही नहीं रहा। प्रतिस्पर्धा में साधन नहीं, सिर्फ साध्य ही बचा रहता है और हम उसी को पाने की जुगत में खोए रहते हैं। सूचना क्रांति की बदौलत मीडिया चीख-चीख कर इसी भौतिक सत्य की लीला का बखान किए जा रहा है। इसलिए यही यथार्थ की सीमा भी बनता जा रहा है और इसी में हम अपनी पहचान भी ढूंढने लगे हैं। यह सब हमारे लिए अस्मिता की तलाश को बाधित करने वाला साबित हो रहा है। व्यक्ति और समाज या व्यष्टि और समष्टि एक दूसरे से दूर खिसकते जा रहे हैं। सभ्यता-विकास के इस पड़ाव पर पहुंच कर नैतिकता, मनुष्यता और उत्तरोत्तर श्रेष्ठ की ओर जाने की चुनौती का स्मरण करना भी अब साहस का काम हो गया है। यह बदलाव इतना भयानक होगा, इसका अनुमान एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने लगा लिया था।

इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में लंबा समय गुजारने वाले गांधीजी ने 40 साल की उम्र में 1909 में 'हिन्द स्वराज' लिखते हुए पश्चिम की सभ्यता का जो खाका खींचा था, वह अब क्रूर सच्चाई बन कर सामने आ रहा है। नितांत अकेले व्यक्ति की सामथ्र्य को हवा देती तकनीकी प्रगति एक मिथ्या जगत की रचना करती है और अपने जाल में फंसाती जाती है।

गहन विचार के बाद गांधी जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि यूरोप और अमरीका में जोर पकड़ती आधुनिक सभ्यता मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं है। इसके समक्ष धर्म-परायण और नीति-प्रधान सभ्यता श्रेयस्कर है। इस बात का व्यावहारिक अर्थ स्पष्ट करते हुए गांधी जी कहते हैं कि सिर्फ अंग्रेजों और उनके राज्य को हटाने भर से स्वराज की प्राप्ति संभव नहीं है। उनके जाने पर भी उन्हीं की सभ्यता और उन्हीं के आदर्श यदि बने रहे, तो व्यावहारिक रूप में हम पहले जैसे ही बने रहेंगे। उन्होंने बिना लाग लपेट के पश्चिमी संस्कृति के सभी पक्षों की सख्त आलोचना की।

उन्होंने अहिंसा की वकालत की, व्यक्तिवादिता का पोषण करती शिक्षा का विरोध किया। अंधी यांत्रिकता का उनका विरोध इस तथ्य पर आधारित था कि यंत्रों के उपयोग के पीछे श्रम की बचत से ज्यादा धन का लोभ है। असहयोग आंदोलन, कानूनों का सविनय भंग और सत्याग्रह के उनके प्रयोग सफल हुए। साथ ही यह भी सबके अनुभव की बात है कि स्वराज को अपनाते हुए स्वतंत्र भारत के नेता गांधी जी की जीवन-दृष्टि को लेकर संशयग्रस्त ही रहे। शिक्षा, न्याय, और सार्वजनिक जीवन की व्यवस्थाओं में गांधी जी के विचारों को बाहर ही रखा गया। महात्मा गांधी का स्मरण सर्वोदय, अहिंसा और शोषणविहीन समाज के लिए जरूरी बदलाव को रेखांकित करता है।