
ऋतु सारस्वत
समाजशास्त्री और स्तंभकार
हाल ही कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पति से अलग रह रही एक महिला की इस मांग पर कड़ी आपत्ति जताई कि पति को हर माह उसे छह लाख रुपए से ज्यादा का गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए जाएं। न्यायालय ने कहा कि 'महिला महीने में इतना खर्च करना चाहती है तो उसे खुद कमाना चाहिए।' महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ललिता कन्नेगंती ने उसे न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग के खिलाफ आगाह किया और कहा कि न्यायालय उन सभी वादियों को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश करेगा जो सोचते हैं कि वे कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं। यह पहला अवसर नहीं है कि न्यायालय को इस तरह की कठोर टिप्पणी करनी पड़ी हो। इससे पूर्व जून 2018 में मद्रास उच्च न्यायालय ने 'हरिहर राज कलिंगरायर बनाम आरती' मामले में पत्नी को अंतरिम भरण पोषण से इनकार करते हुए टिप्पणी की, कि 'यह कहने की आवश्यकता नहीं कि गुजारा भत्ते का प्रावधान एक सामाजिक उपाय है जो कि एक पत्नी को सक्षम बनाता है, चाहे उसका संबंध विच्छेद हुआ हो अथवा नहीं, परंतु इसे पति को परेशान करने या पैसे की जबरन वसूली के तरीके के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकत। विशेषकर उस स्थिति में जब पत्नी कामकाजी हो और पर्याप्त रूप से धन अर्जित कर रही हो।' ये दोनों ही निर्णय न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा दिलाते हैं, परंतु भरण-पोषण का मामला मात्रा कानूनी मसला नहीं है, इससे भी कहीं अधिक यह 'नैतिकता' का मुद्दा है।
भारतीय समाज एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। लैंगिक समानता को लेकर जोरदार पैरवी की जा रही है। विभिन्न नारीवादी समूह स्त्री की सशक्तता और सफलता मात्र 'अर्थ अर्जन' में ही मानते हैं। परिवार व विवाह उसकी दूसरी प्राथमिकता हैं। यह तर्क महिला सशक्तीकरण की पश्चिम से आयातित परिभाषा से जुड़ा है। 'स्वावलंबन' हर महिला का अधिकार है। यह आर्थिक सक्षमता आत्मबल को प्रबल करती है। विद्रूपता यह है कि जो नारीवादी विचारक महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन की पैरवी करते हैं, वही मुखर होकर यह दावा भी करते हैं कि परिवार का समस्त दायित्व मात्र घर के पुरुष सदस्य का है। विशेष रूप से पति का दायित्व पत्नी की सभी जरूरतों को पूर्ण करना है।
समाज द्वारा स्वीकृत दायित्वों की स्पष्ट विभाजक रेखा यह स्वीकार करती है कि पति या घर के पुरुष द्वारा अर्जित आय पर पत्नी एवं बच्चों का पूर्ण अधिकार है परंतु महिला द्वारा अर्जित संपत्ति पूर्णरूपेण महिला की ही धरोहर है। दायित्वों का यह अंतर्विरोध लैंगिक समानता के दोहरे मापदंड को रेखांकित करता है। यह निर्विवाद है कि यदि पत्नी अपने जीवन की मौलिक आवश्यकताओं के लिए पूर्ण रूप से अपने पति पर निर्भर है और स्वयं धन अर्जित नहीं करती तो यह पति का नैतिक दायित्व बनता है कि अलग होने की स्थिति में भी वह अपनी पत्नी की देखभाल एवं आवश्यकताओं को पूर्ण करने की जिम्मेदारी ले। परंतु अगर एक महिला संबंध विच्छेद की स्थिति में, उच्च शिक्षित अथवा कामकाजी होने पर भी अपनी विलासिता का पोषण करने के लिए कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल करके अपनी आकांक्षाओं का बोझ पति पर डाले तो यह अनैतिकता है। स्वावलंबन के बावजूद भरण-पोषण के नाम पर अलग रह रही पत्नियों द्वारा पतियों से अधिक से अधिक धन की उगाही की मानसिकता भारत तक सीमित हो, ऐसा नहीं है।
पश्चिमी देशों में तथाकथित आधुनिकता का लबादा ओढ़े ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत बड़ी है, जो एक ओर लैंगिक समानता की पैरोकार हैं, वहीं दूसरी ओर अपने बल पर विलासितापूर्ण जीवन जीने की बजाय अपने पति से सहज धन प्राप्ति करने का मार्ग चुनती हैं। इसके लिए ऐसी महिलाएं कानून का सहारा लेती हैं। हार्वर्ड में प्रोफेसर एलेक्जेंड्रा किल्लेवाड का कहना है कि हमारी संस्कृति पुरुषों से अपेक्षा करती है कि वही धन अर्जित करे और परिवार की समस्त जिम्मेदारियां को भी वही उठाएं। अमरीका एसोसिएशन ऑफ मेट्रोमोनियल लॉयर्स की अध्यक्ष एलिजाबेथ लिंडसे कहती हैं कि भरण पोषण के मामले में न्यायालय पत्नी की आर्थिक सक्षमता के बावजूद पतियों से यह अपेक्षा करता है कि वह पारिवारिक दायित्व निर्वहनकर्ता बनें।
भारत में भरण-पोषण का कानून लिंग तटस्थ है। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत पति भी गुजारे भत्ते एवं रखरखाव की मांग कर सकता है। इसी वर्ष अप्रेल माह में मुंबई उच्च न्यायालय की न्यायाधीश शर्मिला देशमुख ने एक फैसले में पत्नी को अपने बेरोजगार पति को मासिक गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। अदालती आदेशों को समझते हुए गुजारा भत्ता मामले में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
Published on:
30 Aug 2024 09:14 pm
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