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संपादकीय: शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में भी खाली पद चिंताजनक

देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों, जैसे- एम्स, में डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी चिंता का विषय है। इसके कारण इलाज की गुणवत्ता, मेडिकल शिक्षा और शोध प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी से मरीज निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य असमानता बढ़ रही है। इसके समाधान के लिए भर्ती प्रक्रिया में सुधार, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा और स्वास्थ्य बजट में वृद्धि की आवश्यकता है।

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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Feb 19, 2026

Vacant positions at AIIMS

देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी चिंता का विषय है।

अस्पताल की दहलीज पर उपचार के लिए खड़ा कोई भी व्यक्ति समूचे परिवार की उम्मीद होता है। पिछले सालों में देशभर में इसी उम्मीद को कायम रखने के मकसद से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार भी खूब हुआ है। इसी विस्तार के तहत देश में नए एम्स और मेडिकल कॉलेज खोलने की सरकारी तैयारी स्वागत योग्य कही जाएगी, लेकिन किसी भी चिकित्सा संस्थान में पर्याप्त डॉक्टर और स्टाफ की नियुक्ति समय पर न हो तो चिंता होना स्वाभाविक है। देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एक-तिहाई पदों का खाली होना सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी है।

अकेले नई दिल्ली स्थित एम्स में 34 प्रतिशत पद रिक्त होना बताता है कि जिस संस्थान को देश की चिकित्सा प्रणाली की मेरुदंड माना जाता है, वही भीतर से कमजोर पड़ रहा है। एम्स केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि वह अंतिम उम्मीद है, जहां देश के दूरदराज इलाकों से मरीज जटिल बीमारियों का उपचार कराने आते हैं। यहां डॉक्टरों, नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और फैकल्टी की कमी का असर सीधे इलाज की गुणवत्ता पर पड़ता है। ओपीडी में लंबी कतारें, सर्जरी के लिए महीनों की प्रतीक्षा और आपातकालीन सेवाओं पर असहनीय दबाव परेशान करने वाला है।

यह सिर्फ लोगों के उपचार का ही मामला नहीं है। एम्स जैसे संस्थान चिकित्सा शिक्षा और शोध के केंद्र भी हैं। फैकल्टी के पद खाली रहते हैं, तो मेडिकल छात्रों का प्रशिक्षण प्रभावित होता है। सुपर स्पेशियलिटी कोर्स, उन्नत शोध परियोजनाएं और नई चिकित्सा तकनीकों का विकास बाधित होता है। इसका दूरगामी प्रभाव पूरे देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर पड़ता है, क्योंकि यहीं से प्रशिक्षित विशेषज्ञ भविष्य में विभिन्न राज्यों और संस्थानों की रीढ़ बनते हैं।

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी का सीधा परिणाम यह होता है कि मरीज निजी अस्पतालों की ओर रुख करने को विवश होते हैं। निजी क्षेत्र ने आधुनिक और त्वरित सेवाओं के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है, लेकिन वहां उपचार की अधिक लागत आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण अनियंत्रित रूप से बढ़े और सरकारी ढांचा कमजोर पड़े, तो सामाजिक असमानता गहराती है। यह स्थिति हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करती है।

ऐसी स्थिति में एम्स समेत दूसरे चिकित्सा संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और गति लाने, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा देने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं लागू करने और स्वास्थ्य बजट में वृद्धि करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही, निजी अस्पतालों की फीस संरचना और नियामक ढांचे को भी मजबूत करना होगा, ताकि मरीजों के अधिकार सुरक्षित हों। अब स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने का समय आ गया है।