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Patrika Opinion: धर्म और राजनीति का घालमेल चिंताजनक

ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब शासनाध्यक्षों ने अपने समय के मूर्धन्य धर्माचार्यों की शरण में रह उनके दिग्दर्शन में राजकाज चलाया। लेकिन समय के साथ-साथ धर्म और राजनीति दोनों में विद्रूपता भी आई है।

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Patrika Desk

Mar 30, 2023

Patrika Opinion: धर्म और राजनीति का घालमेल चिंताजनक

Patrika Opinion: धर्म और राजनीति का घालमेल चिंताजनक

धर्म और राजनीति के घालमेल पर लगातार कई मंचों से चिंता व्यक्त की जाती रही है। लेकिन यह विडंबना ही है कि यह घालमेल बढ़ता ही जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी समीचीनहै कि जब तक धर्म और राजनीति को अलग-अलग नहीं करेंगे, नफरत फैलाने वाले भाषणों पर लगाम नहीं लगेगी। सार्वजनिक मंचों पर सभी यह मानते हैं धार्मिक वैमनस्यता उचित नहीं है, लेकिन व्यवहार में ऐसा होता नहीं दिखता। जाहिर है कि राजनेताओं और धर्माचार्यों के एक वर्ग ने स्वार्थवश न तो राजनीति को पवित्र रहने दिया है और न ही धर्म को। जबकि धर्म का पहला मंत्र ही स्वार्थ से मुक्ति पाना है।

धर्म और राजनीति का मेल होना चाहिए या नहीं, इस पर पहले भी व्यापक बहस होती रही है। एक वर्ग यह मानता है कि धर्मविहीन राजनीति अपना उद्देश्य कभी पूरा नहीं कर पाती। धर्म के बिना राजनीति मधु के बिना मधुमक्खियों के छत्ते की तरह है, जो सिर्फ लोगों को काट ही सकती है। इस तर्क में भी तभी तक दम है जब तक धर्म को उसके सच्चे अर्थों में स्वीकार किया जाए। ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब शासनाध्यक्षों ने अपने समय के मूर्धन्य धर्माचार्यों की शरण में रह उनके दिग्दर्शन में राजकाज चलाया। लेकिन समय के साथ-साथ धर्म और राजनीति दोनों में विद्रूपता भी आई है। रही-सही कसर गुलामी के सैकड़ों वर्षों ने पूरी कर दी। आज तो राजनीति कथित धर्माचार्यों के सिर चढक़र बोल रही है। देश की शीर्ष अदालत ने नफरत फैलाने वाले बयानों (हेट स्पीच) को रोकने में नाकाम रहने पर सत्ता को फटकारते हुए यहां तक कह दिया कि वह नपुंसक की तरह व्यवहार कर रही है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना मूल रूप से राज्यों का काम है, इसलिए हेट स्पीच पर रोक लगाने की जिम्मेदारी भी मुख्य रूप से राज्यों की बनती है। लेकिन राज्य सरकारें इसके लिए कोई प्रभावी कदम उठाती नजर नहीं आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर राज्य होता ही क्यों है?

आजादी के दीवानों को भी धर्म और राजनीति के अनैतिक घालमेल की आशंका रही होगी, इसीलिए उस दौरान यह विचार तेजी से आगे बढ़ा कि धर्म और राजनीति को अलग-अलग रहना चाहिए। महात्मा गांधी ने इस विचार को बखूबी आगे बढ़ाया। वे व्यवहार में पूरे धार्मिक थे, लेकिन राजनीति में इससे दूर रहे। भारतीय पुनर्जागरण के दौरान भी धर्म और राजनीति से ऊपर देशहित को रखा गया और विभिन्न धर्मावलंबी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह चिंता जायज ही कही जाएगी।