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आर्ट एंड कल्चर : आभासी दुनिया वरदान तभी, जब इसके गुण-दोष समझें सभी

- आसान नहीं है डगर सोशल मीडिया (social media) की।- आभासी दुनिया के लुत्फ किन कीमतों पर हैं, यह विश्लेषण का विषय है।

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आर्ट एंड कल्चर : आभासी दुनिया वरदान तभी, जब इसके गुण-दोष समझें सभी

आर्ट एंड कल्चर : आभासी दुनिया वरदान तभी, जब इसके गुण-दोष समझें सभी

सुशील गोस्वामी, सदस्य, सीबीएफसी

सोशल मीडिया (social media) बिन अब चैन कहां। पौ फटे या हो सूरज अस्त, हम हो चुके हैं स्क्रीन-परस्त। दरअसल आदमी की खुद को जाहिर करने की और औरों की खैर-खबर लेने की तलब का कोई हिसाब नहीं। सोशल मीडिया का ताना-बाना मनोवैज्ञानिक आधार पर इसी प्यास को तसल्लीबख्श तरीके से बुझाने को बुना गया है। बच्चे, जवान, बुजुर्ग अब आपस में शिकवे नहीं कर सकते, क्योंकि नन्ही गुलगुल यूट्यूब पर 'ट्रिगर्ड इंसान' के 'दर्शन' कर रही है तो दादी रात ढले प्रसाद के लिए कसार बनाने की नूतन विधि सीख रही है। सब लगे हैं।

फर्क यह आ चुका है कि गुलगुल को दादी की कहानियां नहीं चाहिए और दादी भी करती है अब स्क्रीन से प्यार। आभासी दुनिया के लुत्फ किन कीमतों पर हैं, यह विश्लेषण का विषय है। कह सकते हैं कि सोशल मीडिया आदमी की जात की तरह गुण और दोष से लबरेज है। जहां कमरे में अधलेटे पति का 'चाय बना दो' संदेश उसी घर की रसोई में तैनात पत्नी के मोबाइल पर उभर सकता है, वहीं दो परस्पर दूर देशों में रहने वाले भी उतने ही समय में संवाद स्थापित कर सकते हैं। अब इस कमाल को नजदीकियों का ढलना कहें कि दूरियों का पिघलना?

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कुछ बातें अवश्य गम्भीर हैं। राजनीति करने वाले किसी दल द्वारा पोषित आइटी सेल के विरोधी के लिए डॉक्टर्ड वीडियो या गढ़े गए मीम लोगों के मन-मस्तिष्क पर ख़ूब असर डाल सकते हैं, विरोधी दल के किए-धरे को मटियामेट कर डालने की हद तक। लोकतांत्रिक देश के लिए यह खतरनाक है क्योंकि जमीनी काम से ज्यादा स्क्रीन के लिए तैयार की गई पकी-अधपकी कथाओं पर यकीन अंतत: देश के लिए ठीक नहीं। समस्या यह है कि यकीन करने वाले भी कम नहीं हैं क्योंकि वे फेक न्यूज, भाषाई अशुद्धियों, समय के सत्यानाश, साम्प्रदायिक जहर, स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव आदि पहलुओं को जानकर भी उन्हें भुलाए बैठे हैं।

यों सोशल मीडिया तनाव कम करने का भी माध्यम है! मगज में उगते विचारों का, गले में तिरते तरानों का, जहन में पलते बैर का, दिल में उमड़ती दोस्ती का, यानी कि हर इंसानी अभिव्यक्ति का निपटान यहीं तो हो रहा है अब। फिर 'लाइक्स' का हिसाब-किताब भी अपरिहार्य हो गया है। बेशुमार लाइक्स पाने वाले की ठसक उसकी चाल-ढाल से रिसती है, तो ज्ञानियों के अंतर्मन में कम लाइक्स के चलते एक खारापन रड़कता है। जीवन को सरल, सरस बना सकने वाले इस वरदान को अभिशाप में बदलने वाले भी उभर ही आते हैं जो इंसानियत पर धब्बा लगाने को आमादा हैं।

सोशल मीडिया सही अर्थों में जुडऩे का आह्वान है, पर इसका बेजा इस्तेमाल राष्ट्र, समाज व परिवार के समय को कुतर रहा है। आज यह वैश्विक संस्कृति का अभिन्न अंग है और इससे निजात नामुमकिन है, क्योंकि लत बड़ी चीज है। मानवजाति की बढ़ती आभासी मौजूदगी के चलते ही दिनों-दिन इसके मंच उन्नत बनाए जा रहे हैं। भले ही इनसे इनके आकाओं के वृहद आर्थिक हित जुड़े हैं, लेकिन निचोड़ यही है कि तकनीक के साथ यूजर का बौद्धिक उत्थान वक्त की मांग है।