पाकिस्तान के बारे में एक बात तो यह समझ लेनी चाहिए कि वहां की सेना के बारे में फैसले सेना के वरिष्ठ पदाधिकारी ही करते हैं। लोकतांत्रिक प्रतिनिधि की तो केवल मोहर ही लगती है। जो लोग पाकिस्तान के नए आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा के बारे में यह गलतफहमी पाले बैठे हैं कि उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की है तो वे गलत हैं। पाकिस्तान सेना के फैसले उसके सेनाओं के प्रमुख, सेवानिवृत्त जनरल आदि मिलकर करते हैं। उनके इस तरह के फैसलों के बारे में ज्यादा खुलासा नहीं किया जाता।
नियुक्तियों और स्थानांतरण से संबंधित फैसले समय आने पर और दिखावे के लिहाज से लोकतांत्रिक प्रतिनिधि के माध्यम से घोषित होते हैं। इस बात को कहने का संदर्भ यह है कि पाकिस्तान में इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (आईएसआई) के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल रिजवान अख्तर को अचानक हटा दिया गया। उन्हें नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेंट के पद पर तैनात किया गया है जो कामकाज के लिहाज से अपेक्षाकृत शुष्क पद कहा जा सकता है। उनके स्थान पर नावेद मुख्तार को आईएसआई चीफ बनाया गया है। मुख्तार की नियुक्ति पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने की है।
अचानक हुए इस बदलाव के पीछे जो सबसे बड़ा कारण समझ में आता है, वह है बाजवा को आईएसआई प्रमुख के तौर पर ऐसे व्यक्ति की जरूरत महसूस हो रही थी, जो उनका विश्वासपात्र हो। यही वजह है जनरल राहील शरीफ की सेनानिवृत्ति और बाजवा के पदग्रहण के कुछ दिनों बाद ही यह नियुक्ति की गई।
चूंकि जनरल बाजवा की नियुक्ति के बारे में समझा गया कि उनकी नियुक्ति के पीछे नवाज शरीफ का हाथ रहा इसलिए यह प्रश्न उठना भी लाजिमी है कि आईएसआई प्रमुख के पद में अचानक बदलाव के पीछे भी नवाज शरीफ का ही हाथ होगा। मुझे लगता है कि नवाज शरीफ को केवल औपचारिकता भर के लिए जानकारी दी गई होगी। ऐसे फैसला आर्मी के स्तर पर ही ले लिया गया होगा। अब प्रश्न यह है कि नावेद को आईएसआई प्रमुख बनाना तो ठीक है लेकिन रिजवान को हटाना क्यों जरूरी हो गया था? इस बात की आशंका सबसे अधिक है कि भारतीय सेना के नियंत्रण रेखा पार कर सर्जिकल स्ट्राइक करने की घटना से पाकिस्तान आर्मी बौखलाई हुई है। इसे आईएसआई की चूक के तौर पर भी देखा जा रहा है।
हालांकि पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक से इनकार करता रहा है लेकिन इसके तुरंत बाद ही रिजवान अख्तर को हटाना, सर्जिकल स्ट्राइक होने की पुष्टि करता। संभवत: इसीलिए तत्काल उन्हें इस पद से हटाने का फैसला नहीं लिया गया। अब सर्जिकल स्ट्राइक हुए समय बीत गया है और नए आर्मी चीफ ने विश्वासपात्र नियुक्त करने के बहाने के नाम पर रिजवान को हटाया गया है। नावेद मुख्तार के आने से भारत के प्रति आईएसआई के कामकाज की रणनीति में कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है।
जनरल राहील शरीफ के सेवानिवृत्त होने के बाद हमारे कश्मीर को लेकर जनरल बाजवा की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और आने की उम्मीद भी नहीं है। उन्हें खुद कश्मीर मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और उन्होंने कश्मीर के प्रति राहील शरीफ की मुहिम को बरकरार रखा है। ऐसे में कश्मीर को लेकर नावेद मुख्तार की रणनीति में कोई बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अलबत्ता यह जरूर है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत में चल रही नोटबंदी के कारण आईएसआई परेशान जरूर है। सब जानते हैं कि भारत के खिलाफ जिन आतंकियों का वह इस्तेमाल करती रही है, उन्हें वह नकली नोटों के जरिए ही मदद पहुंचाती रही है। वर्तमान में नए आईएसआई चीफ उन आतंकियों की मदद कैसे करें, यह उनके लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन, इससे बड़ी चुनौती पाकिस्तान आर्मी और आईएसआई के लिए बलूचिस्तान है।
उसे वहां चीन के सहयोग से बन रहे आर्थिक गलियारे की सुरक्षा देखनी है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि वहां इस काम में किसी किस्म की अड़चनें आएं। इसके अलावा पाकिस्तान के सामने अफगानिस्तान सीमा पर भी चुनौती है। अफगानिस्तान ने हाल ही में अमृतसर में हुए 'हार्ट ऑफ एशिया' सम्मेलन में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक की खासी आलोचना की थी। आईएसआई के लिए यह भी बड़ी चुनौती होगी कि वह अफगानिस्तान में होने वाली ऐसी आतंकी घटनाओं पर लगाम कसे, जिसके बारे में कहा जाता है कि उनके प्रायोजक पाकिस्तान में छिपे बैठे हैं।
इसके अलावा पाकिस्तान में ही आंतरिक सुरक्षा बड़ी चुनौती बनी हुई है। आईएसआई का ध्यान उस ओर भी रहेगा। इन सबके बावजूद भारत यह सोचकर निश्चिंत नहीं बैठ सकता है कि नए आईएसआई प्रमुख समक्ष कई घरेलू चुनौतियां होंगी। भारत को सावधान रहना ही होगा क्योंकि नए आर्मी चीफ बाजवा ने संयुक्त राष्ट्र के एक शांति अभियान में हमारे पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह के मातहत काम किया था और इसीलिए उनके बारे में कुछ जानकारियां हमारे पास रही हैं। लेकिन, उस तरह की जानकारियां फिलहाल नावेद मुख्तार के बारे में नहीं हैं।