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कान पर भारी पड़ सकती है शोर-शराबे की जीवनशैली

अपनी श्रवण क्षमता की रक्षा करना आप पर निर्भर है। इसलिए आवाज कम करें, अपने बच्चों को शोर के बारे में शिक्षित करें। एक नागरिक के रूप में हर व्यक्ति को अनावश्यक शोर पैदा करने वाली गतिविधियों से दूर रहना चाहिए।

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Patrika Desk

Apr 26, 2023

कान पर भारी पड़ सकती है शोर-शराबे की जीवनशैली

कान पर भारी पड़ सकती है शोर-शराबे की जीवनशैली

डॉ. शुभकाम आर्य
सीनियर ईएनटी कंसलटेंट

तेज शोर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता रहा है। एक सीमा से अधिक शोरगुल सिर्फ बहरापन ही नहीं तनाव, चिंता और मानसिक बीमारी का कारण भी बन सकता है। आधुनिक तकनीक के इस दौर में स्मार्टफोन, हाई पॉवर म्यूजिक सिस्टम, ईयरफोन के बढ़ते उपयोग के साथ ही नाइट क्लब का शोर युवाओं को कम उम्र में ही बहरेपन का शिकार बना रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 150 करोड़ लोग कम सुनने की समस्या से पीडि़त हंै। 12 से 35 वर्ष के लगभग 4.3 करोड़ किशोर व युवा सुनने में कमी की समस्या से जूझ रहे हैं, वहीं 1.1 अरब युवाओं को इसका खतरा है। इनमें से करीब 50 प्रतिशत स्मार्टफोन, म्यूजिक प्लेयर जैसी पर्सनल ऑडियो-वीडियो डिवाइस की वजह से इस समस्या का शिकार हो रहे हंै। इस शोर-शराबे वाली जीवनशैली के चलते आने वाले दिनों में सुनने से संबंधित समस्या व्यापक पैमाने पर सामने आ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक हर 4 में से 1 व्यक्ति सुनने में कमी से पीडि़त होगा। बच्चों में 60 फीसदी तक बहरेपन की समस्या को रोका जा सकता है। इस संबंध में लोगों को जागरूक करने के लिए सेंटर फॉर हियरिंग एंड कम्युनिकेशन द्वारा हर साल अप्रेल के आखिरी बुधवार को अंतरराष्ट्रीय शोर जागरूकता दिवस मनाया जाता है।
तेज आवाज से कान के आंतरिक भाग में स्थित संवेदी कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और इनकी कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। इससे शुरुआत में कुछ समय के लिए सुनाई देना कम हो जाता है। लंबे समय तक लगातार तेज आवाज के संपर्क में रहने पर सुनाई न देने की समस्या स्थायी हो जाती है। 85 डेसिबल से कम आवाज को अधिकतम 8 घंटे तक ही सुरक्षित माना गया है। इससे अधिक हर तीन डेसिबल की बढ़ोतरी पर इसके संपर्क में सुरक्षित रहने का समय आधा हो जाता है। यानी 88 डेसिबल केवल 4 घंटे के लिए व 91 डेसिबल 2 घंटे के लिए ही सुरक्षित है। 112 डेसिबल केवल एक मिनिट के लिए सुरक्षित रहता है। 140 डेसिबल की आवाज के संपर्क में आते ही व्यक्ति बहरा हो सकता है। सामान्य बातचीत 60 डेसिबल, ट्रैफिक 80-85 डेसिबल, मोटरबाइक व ट्रक 100, डिस्को व नाइट क्लब 100 तो रॉक कॉन्सर्ट 110-120 डेसिबल का शोर पैदा करते हंै। एक अध्ययन के मुताबिक 10 में से 5 युवा संगीत या अन्य ऑडियो बहुत तेज आवाज में सुनते हैं। 10 में से 4 युवा संगीत कार्यक्रम और खेल जैसे कार्यक्रमों के दौरान खतरनाक रूप से तेज शोर के आसपास होते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। बदलते परिवेश में हमें शोर के सुरक्षित स्तर पर ध्यान देना होगा, वरना दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। शोरजनित बहरेपन का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। यह स्थायी होता है, इसे सर्जरी या दवाओं से ठीक नहीं किया जा सकता। एकमात्र तरीका बचाव ही है। तेज शोर के संपर्क से बचने के लिए कुछ सरल कदम उठा सकते हैं। मोबाइल, ईयरफोन व म्यूजिक सिस्टम का प्रयोग केवल जरूरी होने पर व सुरक्षित स्तर पर ही करें। तेज पटाखों, लाउडस्पीकर से उचित दूरी बनाएं। लगातार इनके सम्पर्क से बचें । हर दिन कुल मिलाकर 60 मिनट से ज्यादा कान पर लगाकर मोबाइल से बात न करें । मोबाइल को अधिकतम वॉल्यूम के 60 फीसदी से कम स्तर पर रखें ।
शोरगुल वाली जगह पर ईयरफोन का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इस स्थिति में सुनने के लिए बाहरी आवाज से मुकाबला करने के लिए ईयरफोन का वॉल्यूम बहुत तेज करना पड़ता है, जो कान की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। ड्राइव करते समय कान में हेडफोन लगाकर बात करने या रात को ईयरफोन लगाकर गाने सुनते हुए ही सो जाने से कान को नुकसान पहुंच सकता है । इसलिए इन आदतों से बचें। अपनी श्रवण क्षमता की रक्षा करना आप पर निर्भर है। इसलिए आवाज कम करें, अपने बच्चों को शोर के बारे में शिक्षित करें। एक नागरिक के रूप में हर व्यक्ति को अनावश्यक शोर पैदा करने वाली गतिविधियों से दूर रहना चाहिए।