
अब 'मीरा' के जरिये सुपर फूड को मिलेगी नई ताकत
मिलिंद कुमार शर्मा
प्रोफेसर, प्रोडक्शन एंड इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग विभाग, एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर
मोटे अनाज यानी कदन्न (मिलेट्स) को लोकप्रिय बनाने का भारत का अभियान विश्व भर में चर्चा में है। यही वजह है कि मार्च 2021 में इस संबंध में भारत के एक प्रस्ताव के बाद संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय किया। भारत के इस प्रस्ताव को 72 देशों का समर्थन मिला था। अब भारत अपने जी 20 अध्यक्षता काल में भी मोटे अनाज से जुड़े अभियान को आगे बढ़ा रहा है। यही वजह है कि दुनियाभर में मोटे अनाजों के विषय में अन्वेषण करने वाली संस्थाओं में सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से भारत ने मिलेट इंटरनेशनल इनिशिएटिव रिसर्च एंड अवेयरनेस (मीरा) के गठन की पहल की है। इसके तहत एक वेब प्लेटफॉर्म बनाकर इस क्षेत्र के दुनिभा भर के वैज्ञानिकों को जोड़कर मोटे अनाज के विषय में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों के आयोजनों के माध्यम से विश्व भर में जागरूकता फैलाने का कार्य किया जाएगा। भारत इस कार्यक्रम के लिए आरम्भिक राशि के रूप में सीड मनी का योगदान करेगा, जबकि प्रत्येक जी 20 सदस्य राष्ट्र इसमें सदस्यता शुल्क के रूप में वित्तीय भागीदारी देंगे। राजधानी दिल्ली में इसका सचिवालय प्रस्तावित है।
मोटा अनाज मुख्य रूप से शुष्क तथा अद्र्ध शुष्क क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसमें ज्वार, बाजरा, रागी, छोटा बाजरा, बार्नयार्ड बाजरा (सांवाद्ध), कोदो बाजरा इत्यादि हैं। उप-सहारा अफ्रीकी एवं एशियाई राष्ट्रों के लाखों छोटे किसानों के लिए ये महत्त्वपूर्ण फसलें हैं और जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन भी हैं। ये फसलें मानव द्वारा उगाई जाने वाली प्रारम्भिक फसलों में प्रमुख थीं। माना जाता है कि भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रारम्भ से ही बाजरा एवं अन्य मोटे अनाज प्रमुख खाद्यान्नों में सम्मिलित थे। स्वतंत्रता के पश्चात हरित क्रांति खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता एवं विदेशी आयात को कम करने के उद्देश्य से प्रेरित थी, किन्तु इसमें दो फसलों (गेहूं और चावल) पर अधिक जोर दिया गया था। इस दौरान मोटे अनाज को किनारे कर एक 'अनाथ फसलÓ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, तथापि छोटे किसानों ने भोजन और चारे की आवश्यकता पूर्ति के लिए इसकी खेती जारी रखी। इस बीच विश्व वैश्विक जलवायु में परिवर्तन यथा तापमान वृद्धि, अत्यधिक गर्म हवाएं, वनों में आग, अनियमित वर्षा आदि चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर रहा है। भारत भी, तेजी से हो रहे मानसून परिवर्तनों से अप्रभावित नहीं रहा है। लगातार औसत वर्षा में कमी एवं अनियन्त्रित मौसमी चक्र इस ओर लगातार संकेत कर रहा है और इसके फलस्वरूप कृषि क्षेत्र इससे सर्वाधिक पीडि़त हो रहा है। यह उचित समय होगा जब नीति निर्माता मोटे अनाज को कृषि क्षेत्र में टिकाऊ और जलवायु के अनकूल फसल के रूप में प्रचारित करने की अपरिहार्यता का विचार करें।
वर्ष 2018 के बाद भारत सरकार ने मोटे अनाज का नाम बदलकर 'पोषक अनाजÓ कर दिया है और इसके लाभों पर बल देने के उद्देश्य से इसे 'सुपर फूडÓ के रूप में भी प्रचारित किया जा रहा है। ये फसलें जलवायु के अनुकूल एवं वर्षा आधारित होती हैं। ये शुष्क सहिष्णु हैं और पचास डिग्री सेल्सियस तक के कठोर तापमान में जीवित रह सकती हैं। अत: इन्हें 'चमत्कारिक अनाजÓ भी कहा जाता है। मुख्यत: मोटा अनाज खरीफ की फसल के रूप में जाना जाता है। हाल ही में इसमें उपलब्ध उच्च पोषक तत्वों के कारण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे 'श्री अन्नÓ भी कहा है। दूसरे, यह सीमित जल संसाधनों के दोहन को रोकने एवं पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ फसलों के रूप में भी जानी जाती है। साथ ही रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर अपनी निर्भरता कम करके मिट्टी की उर्वरता बनाने में भी अमूल्य योगदान देती हैं। लिहाजा ये फसलें पूरे विश्व के लिए लाभदायक हैं।
Gyan, [3/1/2023 8:27 PM]
मोटे अनाज की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी करके सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सम्मिलित करके तथा विद्यालयों एवं आंगबाड़ी केंद्रों के 'मिड-डे-मीलÓ कार्यक्रम में मोटे अनाज को सम्मिलित करके, इन फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मोटे अनाज की आपूर्ति शृंखला के लिए भंडारण सुविधाएं विकसित करनी होंगी। प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, माल परिवहन के लिए आधारभूत ढांचा भी बनाना होगा। किसानों को सूचना प्रौद्योगिकी से सशक्तीकरण करना भी जरूरी है। मोटे अनाज के भोजन के लाभों का प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है। साथ ही मोटे अनाज की कुकी, नमकीन, लड्डू आदि खाद्य सामग्री के बाजार को बढ़ावा दिया जा सकता है। निस्संदेह समुचित प्रयासों के जरिए मोटे अनाज को खाद्य और पोषण सुरक्षा के अग्रदूत के रूप में भारत वैश्विक पटल पर पूरी दृढ़ता से रख सकता है। इसका यह प्रयास विश्व स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहायक बनेगा।
Updated on:
01 Mar 2023 09:54 pm
Published on:
01 Mar 2023 07:21 pm
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