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अर्थव्यवस्था की गलफांस बना एनपीए!

देश की आर्थिक स्थिति में बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ मुद्रस्फीति कम है। विश्व के आर्थिक हालात को देखते हुए विकास की दर अच्छी है।

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Sunil Sharma

Oct 14, 2017

govt bank

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- प्रो. गौरव वल्लभ अर्थशास्त्री

सरकार ने बैंकों में कई प्रोफेशनल लोगों को नियुक्तकरके व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया। पर बैंक अधिकारी ऋण के मामले में निर्णय नहीं कर पा रहे हैं। जब तक बैंकों में निर्णय लेने की क्षमता नहीं आएगी तब तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना मुश्किल होगा।

देश की आर्थिक स्थिति में बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ मुद्रस्फीति कम है। विश्व के आर्थिक हालात को देखते हुए विकास की दर अच्छी है। अच्छी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार है। चालू और वित्तीय घाटा दोनों नियंत्रण में हैं। चालू वित्तीय घाटा तो मात्र १ फीसदी के आसपास चल रहा है। दूसरी तरफ समस्या यह कि रोजगार में कमी आई है। विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) रिजर्व बैंक ने विकास की अनुमानित दर को कम किया है। रिजर्व बैंक ने पहले इसका अनुमान ७.३ फीसदी लगाया था जिसे अब ६.७ कर दिया है। रोजगार का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है और रोजगार की स्थिति भयावह होती जा रही है।

नोटबंदी और जीएसटी का प्रभाव अभी तक अर्थव्यवस्था पर बना हुआ है। इस प्रकार बड़ी विरोधाभास की स्थिति बनी हुई है। इस विरोधाभास का सबसे बड़ा कारण बैंकिंग सेक्टर है। देश के बैंकिग सैक्टर के हालात बहुत खराब हैं। खराब का मतलब यह है कि सरकारी बैंकों को जो पूंजी सरकार से मिलनी चाहिए थी वो मिल नहीं पा रही है। बैंकों का एनपीए (गैर निष्पादित आस्तियां) लगातार बढ़ रहा है। एनपीए बढक़र ९ लाख करोड़ से अधिक हो गया है। अभी जो पूंजी दी जा रही है वो ऊंट के मुहं में जीरे के बराबर है। सरकार बैंकों का मर्जर कर रही है पर यह स्थायी समाधान नहीं है। यह केवल दर्द निवारक दवा की तरह है जो कुछ समय के लिए राहत दे सकती है।

अभी रीयल इंटरेस्ट रेट 4 फीसदी चल रही है। जो काफी उच्च है। अर्थव्यवस्था में निजी निवेश घट रहा है। निजी निवेश के बिना रोजगार नहीं बढ़ सकते हैं। अर्थव्यवस्था में बेहतरी के लिए हम हम इंडोनेशिया का उदाहरण ले सकते हैं जो करीब २३ करोड़ की आबादी वाला देश हैं। इस आबादी में से सिर्फ १ करोड़ लोग ही टैक्स देने वाले हैं। इंडोनेशिया ने एमेंनेस्टी वॉलंटीयर डिसक्लोजर स्कीम लागू की। इस स्कीम में ३६५ अरब डॉलर मिले जो वहां कि अर्थव्यवस्था की लगभग ४० फीसदी रकम है। हम भी कई बार डिसक्लोजर स्कीम लागू कर चुके हैं लेकिन अभी तक कुछ खास हासिल नहीं हुआ है।

अब देश को एक नई डिसक्लोजर स्कीम की आवश्यकता है। इस स्कीम में जुर्माना राशि कम से कम रखी जाए और इससे आने वाले पैसे का कुछ हिस्सा निश्चित समय तक सरकार इस्तेमाल के लिए अपने पास रखे। इस हिस्से पर ४-५ फीसदी ब्याज दिया जा सकता है। सिंगापुर और स्विट्जरलैंड के साथ आर्थिक संधियां हुई हैं जिससे वहां पर कालाधन रखना मुश्किल होता जा रहा है। कम जुर्माने और दूसरे देशों से संधियों के कारण स्कीम के सफल होने की संभावना अधिक है। पर जुर्माने की राशि अधिक रखी जाती है तो इसका हश्र पहले वाली स्कीम्स जैसा हो सकता है। स्कीम से मिलने वाली रकम को दो क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए। एक तो आधारभूत ढांचे और दूसरा बैंकों में पूंजी डाली जाए। वर्तमान सरकार बनी तब उसने बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया, बैंकों में कई प्रोफेशनल लोगों को नियुक्तकरके व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया। पर बैंक अधिकारियों में भय बैठा हुआ है और लोन को लेकर निर्णय नहीं लिए जा रहे हैं। इसका कारण तीन ‘सी’ हैं। ये हैं सीबीआई, सीवीसी और सीएजी।

इनके भय के कारण जो लोग ईमानदारी से काम करना चाहते हैं वो भी काम नहीं कर पा रहे हैं। जब तक बैंकों में निर्णय लेने की क्षमता नहीं आएगी तब तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना मुश्किल होगा। तीसरा कारण है कि देश में ‘मेक इन इंडिया’ की तो बहुत बात हो रही है लेकिन मेरा मानना है कि मेक इन इंडिया के साथ में ‘डू इन इंडिया’ भी होना चाहिए। जब वर्तमान सरकार का गठन हुआ था तब भारत सेवा क्षेत्र के सिरमोर के रूप में जाना जाता था पर अब ताइवान, मलेशिया जैसे छोटे-छोटे देशों से प्रतिस्पद्र्धा करनी पड़ रही है। डू इन इंडिया के जरिए सेवा क्षेत्र को आगे ले जाया जा सकता है जो मध्यम वर्ग का जन्मदाता रहा है। यदि यही क्षेत्र पीछे रहा तो देश को बड़ा नुकसान होगा।

मौजूदा सरकार कई मामलों में खुश किस्मत भी रही है। वर्ष २०१२-१३ में कच्चे तेल का आयात १६४ अरब डॉलर का था जो कच्चे तेल की दरें कम होने से २०१६-१७ में ८३ अरब डॉलर रह गया। अब सरकार को बड़े निवेश करने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र को निवेश का बड़ा हिस्सा दिया जाना चाहिए। जीएसटी के आने के बाद बड़े कृषि उत्पाद भंडार गृह बनाने की योजना लाई गई है। इसमें निवेश होना चाहिए। कृषि का उत्पादन तो अच्छा है लेकिन उत्पाद सड़ रहे हैं। कृषि क्षेत्र में जब तक बड़ा निवेश नहीं होता तब तक स्थिति नही सुधरेगी।

अर्थव्यवस्था अभी भी जीएसटी और नोटबंदी से नहीं उबर पाई है। जीएसटी के आने के बाद पहले दो क्वार्टर में इसका नकारात्मक असर दिखना ही था। यह आश्चय नही हैं। जीएसटी का प्रभाव मार्च तक बना रहेगा। मार्च के बाद स्थिति सुधार हो जाएगा। इसलिए बैंको का ऋण देने के मामले में भय दूर किया जाए। जब तक बैंक ऋण नहीं देंगे तब तक निजी निवेश नहीं होगा। निजी निवेश नहीं होता तो रोजगार सृजित नहीं हो पाएंगे और ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बहुत ही मुश्किल होगा।