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पत्रिका ओपिनियन: संवेदना और सामाजिक सरोकार के बिना पत्रकारिता की सार्थकता नहीं

मीडिया: पीडि़तों और वंचितों की आवाज बनने की निभानी होगी जिम्मेदारी

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Mar 11, 2024

पत्रिका ओपिनियन: संवेदना और सामाजिक सरोकार के बिना पत्रकारिता की सार्थकता नहीं

पत्रिका ओपिनियन: संवेदना और सामाजिक सरोकार के बिना पत्रकारिता की सार्थकता नहीं

आज का समय सूचना-संचार का है। अधुनातन संचार प्रौद्योगिकी ने सूचना के माध्यमों को बहुआयामी बनाया है। पहले जहां समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के रूप में मुद्रित माध्यम अस्तित्व और व्यवहार में थे। बीसवीं शताब्दी में पहले रेडियो और फिर टेलीविजन अर्थात दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रचलन हुआ। रेडियो से सूचनाएं ग्रहण करने में साक्षरता जैसी अनिवार्यता भी नहीं रही। सुनना ही काफी होता है। फिर टेलीविजन आया। इस माध्यम में पढऩे और सुनने के साथ-साथ देखने की भी सुविधा मिली। माना गया कि देखे हुए का प्रभाव अधिक होता है।

कालांतर में सोशल मीडिया के विविध आयामों ने संस्थागत सूचना-संचार से परे व्यक्तिगत स्तर पर अभिव्यक्ति का अवसर सर्वसाधारण के लिए सुलभ करा दिया। अब यदि समाचारपत्र और रेडियो-टेलीविजन यदि किसी घटना-प्रसंग, अन्याय-अनाचार-अत्याचार की सूचनाओं को अपेक्षित महत्त्व नहीं देते हैं अथवा सही-सही पाठकों तक नहीं पहुंचाते हैं, तो सोशल मीडिया- ट्विटर (एक्स), फेसबुक, वाट्सएप, एस.एम.एस, पॉडकास्ट, यूट्यूब, इंस्टाग्राम आदि कोई न कोई माध्यम उसे जग-जाहिर कर देता है। इसके बावजूद संस्थागत और व्यक्तिगत माध्यमों में एक बुनियादी फर्क होता है। संस्थागत माध्यम नियम-कानून-मर्यादा से बंधे होते हैं, जबकि व्यक्तिगत माध्यमों के नियमन की कोई व्यवस्था नहीं है।

यहां एक बहुत जरूरी सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अन्य उद्योगों-व्यवसायों की तरह कोई उद्यम होती है? क्या समाचार माध्यमों को उत्पाद के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? क्या समाचार माध्यमों को सिर्फ लाभ-हानि की चौखट में कसा जा सकता है? क्या समाचार माध्यमों को किसी एक परिभाषा में बांधा जा सकता है? दूसरा सवाल यह उठता है कि संविधान में प्रेस के लिए लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसा कोई प्रावधान नहीं है। फिर प्रेस को यह मान्यता क्यों दी जाती है? दरअसल, भारत में पत्रकारिता का विकास नवजागरण आंदोलन के साथ-साथ हुआ है। दोनों की चिंताएं और प्राथमिकताएं समान रही हैं। दोनों ने अपने चिंतन और कत्र्तव्य निर्वाह के कारण अवरोध, प्रताडऩाएं और मुसीबतें झेली हैं। यही कारण है कि जन-मानस में प्रेस के प्रति लोकप्रहरी और लोकशिक्षक की अवधारणा बनी। इसकी सबसे जरूरी शर्त लोक विश्वास है। निस्संदेह प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, वेब मीडिया, सोशल मीडिया के क्षेत्र में असाधारण तकनीकी प्रगति हुई है। नई सज-धज आई है। कलेवर बदला है। लेकिन इससे मीडिया में पूंजी का दखल और दबाव भी बढ़ा है। साधन, साध्य पर हावी हो गया है। नेता-अभिनेता-क्राइम-क्रिकेट-सिनेमा-सनसनी पर जोर है। वही बेचो जो भरमाता है, लुभाता है, ललचाता है।

मीडिया का सबसे ज्यादा समय और स्थान तो राजनीति खा जाती है। इस वातावरण में सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं के लिए गुंजाइश कहां? अब माना जाने लगा है कि पत्रकारिता का प्रभाव बढ़ा है, प्रतिष्ठा घटी है। विस्तार हुआ है तो स्खलन भी हुआ है। गुणवत्ता खोई है, संपन्नता पाई है। नाटकीयता और सनसनी ने विश्वसनीयता का संकट उपजाया है। साहित्य और संस्कृति से दूरी ने भाषा को विकृत किया है। संपादक की संस्था का अवमूल्यन हुआ है, जबकि अच्छे पत्र या पत्रिका को संपादक और पाठक का साझा बौद्धिक पराक्रम माना जाता है। टेलीविजन मीडिया में बरती जा रही अति नाटकीयता ने उसे सवालिया निशानों से घेरा है। सोशल मीडिया की पहुंच तो खूब है, परंतु गंभीरता का अभाव झलकता है। इन मुद्दों का तात्पर्य यह कतई नहीं कि मिशन का जो भाव स्वतंत्रता-पूर्व की भारतीय भाषायी पत्रकारिता में कमोबेश रहा है, वही प्रेस का स्थायी भाव रहे। समय के साथ चीजें बदलती हंै। जरूरतें, आशाएं, अपेक्षाएं बदलती हैं। उसी के अनुरूप पत्रकारिता के तेवर बदलते हैं। समाज के सामने जैसी परिस्थितियां आती हैं, उन्हीं के अनुसार पत्रकारिता की प्राथमिकताएं भी बदलती हैं।

यह मानी हुई बात है कि जब हमारे सामने परिस्थितियां कठिन और चुनौतियां विकट होती हैं, तब हमारा सर्वश्रेष्ठ सामने आता है। इसका कारण भी है। पत्रकारिता से दिव्यांग की लाठी, मूक की वाणी और नेत्रहीन की ज्योति बनने की अपेक्षा की जाती है। समाज में अधिकांश लोग अपनी आवाज स्वयं नहीं उठा सकते। पत्रकारिता को उनकी आवाज बनना होता है। सरोकारों और संवेदनाओं का यही तकाजा होता है। मानव हृदय और मस्तिष्क संवेदनाओं से युक्त होते हैं। इनका स्थान मशीनें और प्रौद्योगिकी कदापि नहीं ले सकते। यहां हमें बाजार को भी ठीक-ठीक संदर्भ में समझना होगा। बाजार सदैव से समाज का हिस्सा रहे हैं और रहेंगे, परंतु सेवक और सहायक के रूप में ही बाजार की सहज स्वीकार्यता है। स्वामी की भूमिका में बाजार सामाजिक संकट का कारण बनने लगते हैं।

भारत ऐसा विचित्र देश है जिसमें एक साथ दो देश बसते हैं- भारत और इंडिया। यह प्रकट तथ्य है कि 'इंडिया' का वर्चस्व 'भारत' का शोषण करने वाला है। विकास का प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं बिठाया जाता। जल, जंगल, जमीन, कृषि उपेक्षा के शिकार हैं। शिक्षा और चिकित्सा बाजार के हवाले हो रहे हैं। पत्रकारिता की दृष्टि से ये मूलभूत मुद्दे प्राय: ओझल हैं। जाहिर है, प्रौद्योगिकी और पूंजी पत्रकारिता में विचारशीलता का अभाव पैदा कर रही हैं। तब सार्थक पत्रकारिता कैसे संभव है?

—विजयदत्त श्रीधर,

संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल