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Patrika Opinion: अपेक्षाओं और राजकोषीय घाटे में संतुलन की चुनौती

निश्चित रूप से वित्त मंत्री के लिए इस बजट में सभी वर्गों और सरकार के घटक दलों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के साथ स्वस्थ राजकोषीय नीतियों का अनुसरण बड़ी चुनौती है। देखना दिलचस्प रहेगा कि आखिरकार वह किस वर्ग को कितना खुश रख पाती हैं।

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जयपुर

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Nitin Kumar

Jul 22, 2024

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज करोड़ों देशवासियों की उम्मीदों का बजट पेश करेंगी। इसमें अगले वित्तीय वर्ष का लेखा-जोखा भी होगा और कर निर्धारण भी होगा। आयकर में राहत से लेकर सरकारी कर्मचारियों के लिए नए वेतन आयोग की घोषणा की उम्मीदें भी आसमान पर हैं। इससे पहले सोमवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में अगले वित्त वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर (जीडीपी ग्रोथ रेट) 6.5 से 7.0 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। सर्वेक्षण में रोजगार पर विशेष जोर दिया गया है। कहा गया कि सालाना लगभग 78 लाख नौकरी पैदा करने की जरूरत है। सर्वेक्षण के आधार पर इतना तो तय है कि दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत की विकास दर संतोषजनक कही जा सकती है। भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक ताकत बनना है तो उसे न सिर्फ विकास दर को ऊंचा रखना होगा बल्कि विदेशी निवेश को भी लाना होगा। हर बजट से हर वर्ग को कुछ न कुछ उम्मीद रहती है।

वित्त मंत्री पर बजट पेश करते समय लोकसभा चुनाव में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन का दबाव भी रहेगा। महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कुछ लोक-लुभावन घोषणाओं का भी दबाव रहने वाला है, जैसे कि विशेष रूप से कर्मचारी, किसान और व्यापारी वर्ग को संतुष्ट करना। ये सही है कि महंगाई के मोर्चे पर दूसरे देशों के मुकाबले हमने अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन रोजगार के मुद्दे पर सरकार को ठोस उपाय करने होंगे। देश के सामने बेरोजगारी बड़ी चुनौती है। सिर्फ सरकारी नौकरियों के बूते बेरोजगारी दूर नहीं हो सकती। राजकोषीय घाटे को कम करने की दिशा में भी सरकार को गंभीर प्रयास करने होंगे।

भारत कृषि प्रधान देश है। किसानों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर आंदोलन भी हुए हैं। ऐसे में किसानों के लिए बजट में महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है। दस साल पहले दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में दसवें पायदान वाला भारत आज पांचवें पायदान पर पहुंच चुका है। भारतीय शेयर बाजार भी दुनिया का पांचवां बड़ा बाजार बन चुका है। ऐसे में लोक-लुभावन वादों की जगह राजकोषीय घाटे पर लगाम लगाने की दिशा में खास ध्यान देना होगा। निश्चित रूप से वित्त मंत्री के लिए इस बजट में सभी वर्गों और सरकार के घटक दलों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के साथ स्वस्थ राजकोषीय नीतियों का अनुसरण बड़ी चुनौती है। देखना दिलचस्प रहेगा कि आखिरकार वह किस वर्ग को कितना खुश रख पाती हैं।

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