
हरीश पाराशर
वनस्पतियों का पनपना और हरियाली किसे अच्छी नहीं लगती। वह भी मानसून के इस दौर में। लेकिन जब दूर से नजर आती हरियाली ही पर्यावरण को तहस-नहस करने में सबसे आगे नजर आए तो क्या कहेंगे? यही ना कि ऐसी हरियाली को तो जड़-मूल से खत्म करने में ही भलाई है। बरसों से समूचा राजस्थान ऐसे ही विषझाड़ के फैलाव की समस्या से जूझ रहा है, जिसे बोलचाल में विलायती बबूल कहते हैं। ऐसा पौधा जो पनप जाए तो जंगल, खेत व तालाब सबको चौपट कर दे। विलायती बबूल का वानस्पतिक नाम प्रोसोपिस अकेसिया जूलीफ्लोरा है, लेकिन अलग-अलग इलाकों में इसे दूसरे नामों से भी पुकारा जाता है।
हैरत की बात यह है कि प्रदेश के जंगलात महकमे ने खुद पहल कर बरसों पहले इस विलायती बबूल के बीजों का जंगलों में छिड़काव कराया था और अब पौधे बने ये बबूल भस्मासुर साबित हो रहे हैं। पहाड़ियों की तलहटी, खेतों की मेड़, सिवायचक जमीन और सड़कों के दोनों और लगे ये विलायती बबूल शायद ही किसी के काम आते हों। वैज्ञानिक शोध से यह प्रमाणित हो चुका है कि जूलीफ्लोरा जहां भी पनपता है वहां न केवल धरती का जलस्तर नीचे चला जाता है, बल्कि इसके नीचे घास तक नहीं पनप पाती। कंटीले तारों माफिक इसके कांटे जानवरों को जख्मी कर देते हैं सो अलग।
इतने सारे अवगुणों के बावजूद इस विषझाड़ को आखिर क्यों पनपने दिया गया? वजह भी साफ है। वन विभाग को पौधारोपण के आंकड़े जो बढ़ाने थे। पानी देने की परेशानी से बचने और वन क्षेत्र को हरा-भरा दिखाने के मकसद से ही जंगलों में जहरीले बीजों की बुवाई की गई थी। सरकारें आईं और गईं। विलायती बबूल के खतरों को लेकर सिर्फ चिंतन ही होकर रह गया।
चिंता किसी ने नहीं की। चार बरस पहले कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के वन मंत्री सुखराम विश्नोई ने जोर-शोर से ऐलान किया था कि चार साल में राजस्थान के चप्पे-चप्पे से विलायती बबूल खत्म कर देंगे। इतना ही नहीं मंत्री ने तब यह भी कहा था कि जूलीफ्लोरा को हटाने के बाद इनकी जगह ऐसी प्रजाति की वनस्पति लगाई जाएगी जो इस विलायती बबूल के विष से लड़ने को सक्षम होगी।
जाहिर है मंत्री ने कहा था तो इस दिशा में कवायद भी आगे बढ़ी होगी। सर्वे के नाम पर बजट भी जारी किया गया होगा। जंगल-जंगल जूलीफ्लोरा की तलाश की मुनादी भी हुई होगी। न अब वह सरकार रही और न ही मंत्री। और विभाग तो मंत्री के इस ऐलान को भूल ही गया होगा। चार साल भी बीत गए। पर विलायती बबूल जस के तस हैं।
चिंता इस बात की भी है कि सब कुछ जानते-बूझते भी इस विषझाड़ को समूल खत्म करने की दिशा में ठोस कदम कभी उठाए ही नहीं गए। होना तो यह चाहिए कि जनता के लिए कई संकट न्यौतने वाले इस विलायती बबूल को और पनपने ही नहीं दिया जाए। अभी बरसात का दौर है। विलायती बबूल को जरा सी भी नमी मिली तो इसे पनपने से कोई नहीं रोक सकता। यही मौसम है जब इस जहर बुझी वनस्पति को जड़ से उखाड़ने का काम शुरू किया जा सकता है। वन विभाग को हो सकता है विलायती बबूल से मोह हो। इसलिए वह जंगलात की जमीन का नम्बर भले ही बाद में लें, लेकिन आबादी क्षेत्र में भी उग आए इस कंटीले जंगल को बढ़ने से रोकना ही होगा।
मौजूदा सरकार इस दिशा में कुछ कर पाएगी यह उम्मीद जरूर की जानी चाहिए, लेकिन सरकार खुद ही छोटे-बड़े शहरों में सजावटी पौधों के नाम पर बोगनवेलिया से आगे बढ़ती ही नहीं। अभी मानसून का शबाब पर आना बाकी है। प्रदेश भर के कई सूखे तालाबों में ये कंटीले झाड़ पसरे पड़े हैं। तालाबों में पानी की आवक से पहले इन्हें नहीं हटाया गया तो ये लबालब होने वाले तालाबों में इंसान और मवेशियों दोनों के ही जान के दुश्मन बन जाएंगे। अभी भी वक्त है जब इन जहर बुझे कांटों को जड़ से उखाड़ा जाए अन्यथा पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।
Published on:
19 Jul 2024 04:02 pm
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