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POLI नोक-झोंकः पूड़ी, गुलाब जामुन और रायता

अरे, सब कुछ बॉक्स ही डिजाइन कर रहा है - कब पैरों का प्लास्टर खुलना है, कब मुंह खुलना है, कब पीछे रंग पिंक होगा, कहां इंटरव्यू होगा, और तो और खाने में क्या बनेगा लबाबदार पनीर या फिर मसालेदार गट्टा?

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Nitin Kumar

Nov 07, 2023

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छत्तीसगढ़ में आज पहले चरण की पोलिंग। चुनाव प्रचार कार्यालयों पर ताले। मुफ्त की रसोई बंद। कुछ, दूसरे चरण वाले नेताओं के चरणों में। कुछ एमपी सरक लिए, कुछ राजस्थान। मिजोरम में भी चुनाव आज ही हैं, तेलंगाना दूर है।
देश के सबसे बड़े राज्य की हॉट सीट। नेताजी का चुनाव प्रचार ‘प्रधान’ कार्यालय। कार्यकर्ताओं का लंगर।
आदमी एक:(मुंह गमछे से ढका हुआ है) वाह, आलू की सब्जी और पूड़ी, साथ में टिपोरे... इस खाने का कहना ही क्या!
कमल खिलावन: ये आवाज सुनी-सी लगती है। भाई जरा गमछा तो हटाना। ( मुंह से गमछा हटाता है।)
कमल खिलावन: पंजा सिंह तुम। तुम यहां, हमारी पंगत में...
पंजा सिंह: हें हें हें... किसी महान शख्स ने कहा है, धरती, आकाश, हवा और पूड़ी पर सबका हक है।
कमल खिलावन: पर तुम यहां कैसे?
पंजा सिंह: यार, हमारे यहां रसोइये राजस्थान के नहीं हैं, वो स्वाद ही नहीं आ रहा खाने में।
कमल खिलावन: तो क्या रसोइये भी ‘बंगलुरु’ से ‘डिजाइन’ होकर आए हैं... हे हे हे... (इतराते हुए।)
पंजा सिंह: अरे, सब कुछ बॉक्स ही डिजाइन कर रहा है - कब पैरों का प्लास्टर खुलना है, कब मुंह खुलना है, कब पीछे रंग पिंक होगा, कहां इंटरव्यू होगा, और तो और खाने में क्या बनेगा लबाबदार पनीर या फिर मसालेदार गट्टा?
कमल खिलावन: पर कल रात तुम्हारे यहां गुलाब जामुन कमाल के थे।
पंजा सिंह: तुम्हें कैसे पता?
कमल खिलावन: तो क्या गमछा सिर्फ तुम्हारे पास है, हमारे पास नहीं।
पंजा सिंह: तुम भी... (हे हे हे...) तो हम एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। लेकिन तुम वहां क्यों?
कमल खिलावन: गुलाब जामुन खाने। सत्ता के गुलाब जामुन और स्वादिष्ट होते हैं। पर तुम्हारे यहां रायता फैलता दिख रहा है।
पंजा सिंह: तुम ठीक कह रहे हो। आचार संहिता से पहले तक का स्वाद मस्त था, अब देसी घी की जगह वनस्पति यूज होने लगा है। चावल भी बासमती की जगह टुकड़ी चलाई जा रही है।
कमल खिलावन: चिंता मत करो, हम सत्ता में आ रहे हैं। हम चखाएंगे स्वाद देसी घी में बने व्यंजनों का।
पंजा सिंह: अरे जाओ... रिपीट तो हम ही कर रहे हैं। इतिहास बदलेगा।
कमल खिलावन: छोड़ो यार, हम तो हर बार की तरह लडऩे लगे।
पंजा सिंह: सही फरमाया, खाने के वक्त लड़ाई नहीं, तुम पूड़ी खिलाओ, हम रात को गुलाब जामुन खिलाएंगे, हमारे यहां। अरे नाथू... गरम गरम पूड़ी तो ला। (रायता पीते हुए की आवाज आती है... सुड़ुक...)
- सुप्रिया शर्मा