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लोकतंत्र पर हावी न हो राजनीति, सत्ता और बाजार

भारतीय संसदीय प्रणाली: विकासक्रम में कुछ विकृतियां आ चुकी हैं, जिन्हें दूर करना ही होगा

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जयपुर

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Nitin Kumar

Aug 28, 2024

कैलाश चन्द काण्डपाल
राज्य प्रमुख, अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन, झारखण्ड
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर लाल किले की प्राचीर से ‘एक देश-एक चुनाव’ की बात छेड़ी और यह जताया कि उनकी सरकार इस मसले को लेकर गंभीर है। दूसरी ओर, जब तक इसे लागू करने की जमीन पूरी तरह तैयार नहीं हो जाती, देश में चुनावों का सिलसिला यों ही जारी रहेगा। इस वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर व हरियाणा में और फिर महाराष्ट्र व झारखंड में चुनाव होने हैं। देश में जब-जब चुनाव की बात होती है, संसदीय प्रणाली और इसके इर्द-गिर्द विकसित होती राजनीति, सत्ता और बाजार के प्रभाव पर मंथन की जरूरत शिद्दत से महसूस की जाती है, क्योंकि आजाद भारत की ७७ वर्षों की यात्रा में भारतीय संसदीय प्रणाली में ऐसे कई विचलन आ चुके हैं, विकास क्रम में जिनका आना तो स्वाभाविक है पर इन पर ध्यान देना और इनका निवारण करना भी जरूरी है।

दो विचलन उल्लेखनीय हैं। पहला विचलन चुनाव प्रक्रिया से संबंधित है, जबकि दूसरा विचलन राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा है और लोकतंत्र अपनाने के बाद देश में सत्ता हासिल करने वाली हर पार्टी ने इस विचलन को लाने में अपना समुचित योगदान दिया है। समय रहते इन्हें दुरुस्त नहीं किया गया तो ये लोकतंत्र की विकृति का कारण बन सकते हैं। संसदीय प्रणाली में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के द्वारा प्रतिनिधि चुनने का आशय यह है कि वह जनप्रतिनिधि स्वयं या अपने राजनीतिक दल के माध्यम से शासन व्यवस्था में अपना योगदान देगा तथा अपने क्षेत्र के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेगा। समय के चलते प्रतिनिधि को चुनना गौण हो गया है और चुनाव प्रक्रिया में इस विचलन के लिए राजनीतिक दल और मतदाता समान रूप से जिम्मेदार हैं। चुनाव प्रक्रिया में अब प्रतिनिधि का क्षेत्र विशेष से होने की आवश्यकता को अब आवश्यकता नहीं समझा जाता है क्योंकि उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सीट जीतना हो गया है। इस चुनाव प्रक्रिया में दूसरी बात बाजार के प्रभाव की है। आज यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि चुनाव जीतना एक तरह का इवेंट मैनेजमेंट बनता जा रहा है और इस क्षेत्र में आज कई कंपनियां जोर आजमाइश कर रही हैं। लोकलुभावन नारे व प्रलोभन तैयार करना, मतदाता को आकर्षित करना और कैसे भी भीड़ जुटाकर जीत के लिए माहौल बनाना इसमें शामिल है। बाजार से लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट करने की अपेक्षा करना बेमानी है, क्योंकि बाजार का अपना चरित्र होता है, जिसमें ग्राहक की संतुष्टि सर्वोपरि होती है। इसलिए लोकतंत्र के चुनाव में बाजार का प्रवेश एक गंभीर मसला है जो कि अच्छा लक्षण नहीं है।

भारत की राजनीति में राजनीतिक दलों द्वारा केन्द्र में सत्ता प्राप्त करना एक प्रमुख लक्ष्य होता है क्योंकि भारत की संघीय व्यवस्था में केन्द्र की तरफ शक्ति का स्पष्ट झुकाव है। केन्द्र के कई महत्त्वपूर्ण संस्थान इस सत्ता के प्रभाव में आते दिखते हैं भले ही उनमें स्वायत्तता का पुट हो। राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता का दुरुपयोग और राजनीति में बाजार का प्रभाव, ये दोनों बातें अलग-अलग दिखती हैं पर ये मिलकर लोकतंत्र को कमजोर बनाने में भरपूर योगदान देती हैं। सत्ता के दुरुपयोग से जहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, वहीं बाजार ऐसी सत्ता को प्राप्त करने और बनाए रखने में अपना योगदान देता है।

अब सवाल यह उठता है कि बेहतर लोकतंत्र बनाए रखने के लिए आशा की किरण कहां पर है। यह पूरा प्रकरण इतना नकारात्मक भी नहीं कि इससे निजात नहीं मिल सकती। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्य विशेषता है एक अंतराल के बाद चुनाव की प्रक्रिया और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार। मतदाता जागरूक होंगे तो राजनीतिक दल भी स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराएं अपनाने के लिए मजबूर होंगे। न्यायपालिका और मीडिया की भी विचलन को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

निष्कर्ष यह है कि कोई भी प्रणाली हो, समय-समय पर समीक्षा जरूरी है। विचलन को नजरअंदाज करने के दूरगामी परिणाम देश के नागरिकों को ही भुगतने होंगे। भारत के संविधान की प्रस्तावना में हमने भारत को एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य के रूप में देखने का संकल्प लिया है। जरूरत है कि एक नागरिक के तौर पर हम इस संकल्प को सच्ची भावना के साथ फलीभूत करने में अपने योगदान के प्रति सजग हों। इसी से हमारा देश एक स्वस्थ लोकतंत्र के रूप में विश्व पटल पर अपनी पहचान बना पाएगा।