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Patrika Opinion: बाघों की बढ़ती मृत्यु दर की रोकथाम भी जरूरी

भारत में बाघों की बढ़ती आबादी के बीच इनकी मृत्यु दर बढ़ने पर भी गंभीर चिंतन की जरूरत है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुताबिक, इस साल जनवरी से जुलाई तक करीब 112 बाघों की मौत हो चुकी है।

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Nitin Kumar

Jul 30, 2023

Patrika Opinion: बाघों की बढ़ती मृत्यु दर की रोकथाम भी जरूरी

Patrika Opinion: बाघों की बढ़ती मृत्यु दर की रोकथाम भी जरूरी

एक दौर था, जब भारत में बाघों की घटती आबादी स्थायी चिंता का विषय थी। इसी चिंता से रूस, कंबोडिया, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश भी जूझ रहे थे। भारत समेत बाघ परिक्षेत्र वाले 13 देशों (टीआरसी) के 2010 में रूस के पीटर्सबर्ग में हुए शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में 2022 तक वैश्विक स्तर पर बाघों की संख्या को दोगुना करने का संकल्प लिया गया था। गौरव की बात है कि बाघों के संरक्षण और उनकी आबादी बढ़ाने के मामले में हम दूसरे देशों से सबसे आगे हैं।

पीटर्सबर्ग शिखर सम्मेलन के समय भारत में 1,706 बाघ थे। इस बार विश्व बाघ दिवस (29 जुलाई) पर जारी भारत के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक देश में बाघों की संख्या अब 3,682 हो गई है। यानी हम पीटर्सबर्ग सम्मेलन के संकल्प के लक्ष्य से भी आगे निकल गए हैं। यह रिपोर्ट उत्साह बढ़ाने वाली है। हमारे लिए यह भी गौरव की बात है कि दुनिया के 75 फीसदी बाघ भारत में हैं। यह बाघों के संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर चलाए गए विशेष लक्ष्य आधारित कार्यक्रमों का सुखद नतीजा है।

भारत में बाघों की बढ़ती आबादी के बीच इनकी मृत्यु दर बढऩे पर भी गंभीर चिंतन की जरूरत है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुताबिक, इस साल जनवरी से जुलाई तक करीब 112 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें प्राकृतिक मौतों से ज्यादा मामले शिकार व बाघों के आपसी संघर्ष के हैं। हर बाघ अपने रहने के लिए बड़ा इलाका चाहता है। किसी दूसरे बाघ के इलाके में पहुंचने पर संघर्ष के हालात पैदा हो जाते हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अभयारण्यों के वन क्षेत्र में मानव बस्तियों के विस्तार ने हालात और जटिल कर दिए हैं। सिकुड़ते जंगलों के कारण 25 फीसदी से ज्यादा बाघ संरक्षित इलाकों के बाहर रह रहे हैं। इससे बाघ-मानव संघर्ष भी बढ़ा है।

भले ही हमने पीटर्सबर्ग सम्मेलन का लक्ष्य हासिल कर लिया हो, बाघों के प्रभावी संरक्षण के लिए अभयारण्यों के सुचारु प्रबंधन की दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। देश के करीब आधे टाइगर रिजर्व में सडक़, हाईवे और रेल नेटवर्क विस्तार के कामों से बाघों के लिए इलाके घटने का खतरा मंडरा रहा है। इससे भी बड़ा खतरा शिकारियों से है, जो खाल, दांतों और नाखूनों की तस्करी के लिए बाघों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे शिकारियों पर नकेल कसने की जरूरत है, जो अपने फायदे के लिए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ‘बाघों में बहार’ कायम रखना प्रोजेक्ट टाइगर की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।