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पदोन्नति : काम से या नाम से?

एक ओर जहां देश को आगे ले जाने के लिए जातीय आरक्षण को खत्म करने की बहस जोरों पर है, वहीं सरकारें

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Mukesh Kumar Sharma

May 05, 2016

Ethnic reservation

Ethnic reservation

एक ओर जहां देश को आगे ले जाने के लिए जातीय आरक्षण को खत्म करने की बहस जोरों पर है, वहीं सरकारें इसे आगे बढ़ाकर नौकरियों में पदोन्नति पर भी आरक्षण देकर देश को पीछे धकेलने पर आमादा हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सही पहल करते हुए पदोन्नति में कोटा को खारिज किया पर राज्य सरकार अब सुप्रीम कोर्ट जाएगी। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि राज्य इसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं। पर सरकारों के लिए तो आरक्षण वोट खींचने वाली ऐसी चुंबक है, जिसे वे हरगिज खोना नहीं चाहतीं। यूपीए सरकार ने एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण की पहल की थी, अब एनडीए सरकार इसे आगे बढ़ाने को तैयार है। यानी नौकरी में भी आगे बढऩे के लिए काम नहीं, 'नामÓ काम आएगा।

यह सिस्टम के लिए घातक होगा


मोहन दास मेनन पूर्व अतिरिक्त सचिव, केंद्र सरकार

मेरा बहुत स्पष्ट मानना है कि पदोन्नति में आरक्षण का कोई भी तरीका कतई इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग या किसी जाति और पंथ के आधार पर पदोन्नति में आरक्षण दिया जाना चाहिए। कोई भी नौकरी का दावेदार अपनी काबिलियत से चुना जाता है और उसकी दक्षता और कार्य प्रदर्शन के आधार पर ही उसे पदोन्नति दी जानी चाहिए। कामकाज, उत्तम कार्य पर ही प्रमोशन मिलना चाहिए। अगर कोई अधिकारी या नौकरशाह कम काम करने के बावजूद पदोन्नति पाता है और कोई अच्छा काम करके भी पदोन्नति नहीं पाता है तो सिस्टम की सारी दक्षता खत्म होती जाएगी। मेहनतकश अधिकारियों के कामकाज में गिरावट आएगी।

सिस्टम में सब सिर्फ प्रतिनिधि

हमारे लोकतंत्र की सर्वोत्तम बात यह है कि यह प्रतिनिधित्व लोकतंत्र (रेप्रिजेंटेटिव डेमोक्रेसी) है। इसमें किसी भी जाति-पंथ या धर्म का व्यक्ति हो, उसे सर्वोत्तम काम करना चाहिए। उसकी पदोन्नति अनिवार्य है, बशर्ते वह अच्छा काम कर रहा हो। इसे विवाद का विषय ही नहीं बनाना चाहिए। जो अफसर अच्छा काम नहीं करता है, उसकी पदोन्नति नहीं होनी चाहिए वरना रेप्रिजेंटेटिव डेमोक्रेसी पर असर पड़ेगा।


सरकार इसे लागू न करे तो ही बेहतर होगा। हमारा लोकतंत्र इस दौर में इसलिए ही काम नहीं कर पा रहा है क्योंकि हमने प्रतिनिधियों के लिए मानदंड नहीं बांधे कि उन्हें कितना और क्या काम करना है। उन पर प्रदर्शन करने का कोई दबाव नहीं है और इसके लिए कोई पैमाना भी नहीं बनाया गया है। दक्षता का पैमाना सबके लिए एक समान होना चाहिए। वही आगे जाए जो जरूरी दक्षता साबित करे और उस ओहदे के लिए लाभदायक हो। पदोन्नति का पैमाना तो सिर्फ और सिर्फ काम ही रहना चाहिए।

स्पर्धा मानो खत्म हो जाएगी

अब सवाल है कि हमारी सरकारें पदोन्नति में आरक्षण लागू करने के लिए क्यों आमादा हैं? क्योंकि वे यहां भी आरक्षण का झुंझुंना बजाकर वोट गिनने में लगी हैं। आरक्षण जहां जरूरत है, वहां होना चाहिए। भारतीय संविधान के हिसाब से वह लागू भी हो। पर जो व्यक्ति सिस्टम में प्रतिनिधित्व कर रहा होता है तो वह जाति-पंथ और धर्म से ऊपर होता है। यही एक कारण होता है, जिससे बड़े-बड़े लोकतंत्र काम करते हैं। एक ही विभाग, एक समान अफसरों के लिए इम्तिहान के दो अलग-अलग तरीके नहीं हो सकते। वैसे भी पदोन्नति देने के लिए पैमानों के निर्धारण कैसे किए जाएंगे? किसी भी खेल की टीम में जो खिलाड़ी अच्छा होता है, जो प्रदर्शन करता है, उसे मौका दिया जाता है। उसे आगे बढ़ाया जाता है। खराब प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी को तो टीम में शामिल ही नहीं किया जाता।


इसी तरह लोकतंत्र में सबके लिए समान अवसर हैं, जो दक्ष होता है, प्रतिस्पर्धा में खरा उतरता है तो वह आगे बढ़ता है। अगर नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण लागू कर दिया तो स्पर्धात्मक रवैया खत्म होता जाएगा। सिस्टम की कार्यशैली पर नकारात्मक फर्क पड़ेगा। सिस्टम के लिए घातक साबित होगा। जो कार्य कुशलता में कमजोर है, वह अनुत्पादक ही साबित होगा। प्रदर्शन ही केवल एक पैमाना होता है। जनता भी चुने हुए प्रतिनिधि से सिर्फ प्रदर्शन ही चाहती है। चाहे वह मेयर हो या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री। बाहरी देशों में लोकतंत्र का जब निर्माण हो रहा था तब प्रतिनिधियों के आगे बढऩे का पैमाना प्रदर्शन ही रखा गया था। इसलिए आरक्षण नियुक्तियों तक ही सीमित रखें, इसे आगे न बढ़ाएं।


एम.नागराज बनाम केन्द्र सरकार मामला

वर्ष 2006 में दिए गए एम.नागराज बनाम केन्द्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इस मामले में हाईकोर्ट में कहा गया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में पदोन्नतियों में आरक्षण दिया जा सकता है। लेकिन इसके लिए तीन शर्तें पूरी करनी होगी।

1 पहली शर्त यह रखी गई कि पिछड़ेपन की सीमा का निर्धारण राज्य को करना चाहिए कि कौन कितना पिछड़ा है और कितना नहीं। इसके बाद ही पदोन्नति पर विचार किया जाना चाहिए।

2 कर्मचारियों ने सेवा में कितनी अवधि बिताई है और कर्मचारियों की कितनी कमी है?
3 इस प्रकार के पदोन्नति आदेशों का असर प्रशासनिक दक्षता पर नहीं पड़े इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का मामला


भोपाल के अरुण द्विवेदी, आरबी राय,एम.सी.पांडे, एमपी इलेक्ट्रिसिटी प्रोडक्शन कंपनी, एस.के.गुप्ता समेत सामान्य वर्ग के कई कर्मचारियों की ओर से मध्यप्रदेश के पब्लिक सर्विस प्रमोशन नियम 2002 को चुनौती देते हुए 2011 व इसके बाद इन नियमों की संवैधानिकता पर सवाल खड़ा किया था। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि इस नियम के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 बी के तहत वर्णित समानता के अधिकारों का उल्लंघन है। इसलिए एक बार सेवा में नियुक्ति के लिए पदोन्नति का लाभ लेने वालों को दुबारा इसका लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने मप्र लोकसेवा प्रमोशन नियम -2002 को असंवैधानिक करार दिया। साथ ही कहा कि इस नियम के तहत दी गई सभी पदोन्नतियां अवैध मानी जाएगी।

अब भी उठा रहे आरक्षण का लाभ
ड्डष्सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका को निर्देश दिया था कि वह बराबर नजर रखें कि आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। वास्तविकता ये है कि नौकरियों और पदोन्नति में जातिगत आरक्षण का सारा लाभ अधिकतर वे लोग ले लेते हैं जिनके पास सब कुछ है । पिछड़े वर्गों के उच्च पदों पर बैठे लोगों में कई की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत है फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं।

सरकार देगी चुनौती

'हमारी सरकार नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण की पक्षधर है। हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।Ó
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश
( हाईकोर्ट के फैसले के बाद )

दलित क्यों न बनें अधिकारी

चंद्रभान प्रसाद दलित चिंतक

भारत का समाज इतना नहीं बदला है कि वह दलित समुदाय के व्यक्ति को अपना बॉस मान सके। गैर दलित समाज के लोगों को अपने अंदर झांककर देखना चाहिए कि क्या वाकई समाज में इतना अधिक बदलाव आ गया है? हमारा अनुभव तो यह कहता है कि भारतीय समाज में गैर दलित समुदाय के लोग दलित समुदाय के व्यक्ति को अपने बराबर तो बैठाने को तैयार हो गए हैं लेकिन उन्हें अपना अधिकारी स्वीकार करने की मन:स्थिति में नहीं है। इसमें बदलाव आना बेहद जरूरी है।

परीक्षा में भेदभाव

मेरी जानकारी में लखनऊ की करीब 18 साल पुरानी एक घटना है। वहां एक सवर्ण अधिकारी सेवानिवृत्त हुए। पहले उनके ऑफिस के सभी लोगों ने उनकी विदाई में चाय पार्टी दी और फिर बाद में निजी लोगों की पार्टी रखी गई। इस निजी पार्टी में उन्होंने अपने भाषण में अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने दलित समुदाय के सहयोगियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) खराब की। दलित समुदाय के किसी भी अधिकारी से पता कर लें कि उसके अंक लिखित परीक्षा में बेहतर थे या साक्षात्कार में? वह हमेशा लिखित परीक्षा के अंकों को बेहतर बताएगा।

इसी तरह किसी भी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे दलित विद्याथियों का कहना है कि उन्हें बाह्य परीक्षा में आंतरिक परीक्षा मूल्यांकन की अपेक्षा बेहतर अंक मिलते हैं। उन्हें प्रायोगिक परीक्षा के मुकाबले लिखित परीक्षा में बेहतर अंक मिलते हैं। इन बातों का अर्थ यह है कि अब भी समाज में पर्याप्त बदलाव नहीं आया है। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा की व्यवस्था लागू की तो ईस्ट इंडिया कंपनी को यह आदेश जारी करना पड़ा कि शिक्षा के मामले में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। जरा सोचिए कि ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि दलित समुदाय के बच्चे जब स्कूलों में जाने लगे तो इसके विरोध में देश में खूब दंगे हुए। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र और गुजरात में दंगे हुए।

सोच नहीं बदली

सवर्णों ने अपने बच्चों को यह कहकर स्कूलो से निकालना शुरू कर दिया कि वे दलित समुदाय के बच्चों के साथ अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकते। हमारे बड़े भाई थानेदार हो गए थे और हमारी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी। हम लोग कुछ बेहतर कपड़े पहनने लगे थे। लोग अकसर हम लोगों से हमारी जाति पूछते थे और जब हम अपनी जाति बताते थे लोग हमसे कहते, क्यों मजाक कर रहे हैं? दु:ख होता है कि लोग कपड़ों की स्थिति से जानने की कोशिश करते हैं कि दलित कौन हैं? राजस्थान में तो आज भी ऐसी घटनाए देखने-सुनने को मिल जाती हैैं कि दलित समुदाय का दूल्हा घोड़े पर बैठकर बारात नहीं निकाल सकता? वैवाहिक औपचारिकता के लिए तलवार लेकर नहीं चल सकता।


सवर्ण विरोध में खड़े हो जाते हैं। देश के कई भागों में आज भी विवाह समारोह में लोग दलित समुदाय के लोगों को अपने बराबर बिठाकर भोजन नहीं करने देते। जब समाज में आज भी ऐसी स्थितियां तो दलित समुदाय के व्यक्ति को कोई अपना अधिकारी कैसे स्वीकार करेगा? ऐसे में पढ़ाई, फिर नौकरी और उसके बाद पदोन्नति में भी आरक्षण की जरूरत तो महसूस होती ही है।