
चंद्रवंशी राजा नहुष
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
वृत्रासुर के वध के कारण जब देवराज इंद्र पर ब्रह्म हत्या का दोष लगा, तो देवगुरु बृहस्पति की आज्ञा से वे हजार वर्षों तक तपस्या करने चले गए। देवराज का सिंहासन खाली हो गया। तब सभी देवताओं ने पृथ्वीलोक के किसी महात्मा शासक को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठाने का निर्णय लिया। इस प्रकार चंद्रवंशी राजा नहुष को स्वर्ग का शासक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
महाराज नहुष की जिस सज्जनता के कारण देवताओं ने पृथ्वीलोक से उनका चयन किया था, देवराज बनने के साथ ही उनकी उस सज्जनता का लोप हो गया। वे देवताओं पर प्रकृति के नियमों के विरुद्ध आचरण करने का अनावश्यक दबाव बनाने लगे। इतना ही नहीं, वे इंद्राणी शची पर मोहित हो कर उनको प्राप्त करने का कुत्सित प्रयास करने लगे।
यह कथा सुनने में भले अलौकिक लगे, पर अतिशयोक्ति नहीं लगती। यहां सहज मानवीय दुर्गुण स्पष्ट दिखता है। किसी भी व्यक्ति को यदि उसकी योग्यता से अधिक मिल जाए तो उसके समस्त दबे हुए अवगुण उभरने लगते हैं। वह अहंकारी, क्रोधी और अत्याचारी हो जाता है। आवश्यकता से अधिक सम्मान व्यक्ति के सद्गुणों की हत्या कर देता है। महाराज नहुष के साथ यही हुआ।
तपस्या पूर्ण करने के पश्चात जब इन्द्र स्वर्ग लौटे। गुरु की आज्ञा से उन्होंने यज्ञ किया, जिससे वे दोषमुक्त हुए। लेकिन स्वर्ग के सिंहासन पर तो नहुष विराजमान थे, इस कारण इन्द्र देवराज होकर भी देवराज नहीं हो सके। इधर, नहुष देवी शची से मिलने को आतुर थे। शची ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वे यदि सप्तर्षियों की पालकी पर बैठ कर उन तक आएं तो वे उन्हें पा सकेंगे। वासना में अंधे हो चुके नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी ढोने को विवश किया, फलत: सप्तर्षियों के शाप से महाराज नहुष स्वर्ग से निष्कासित हुए और सर्प योनि को प्राप्त हुए।
देवराज इंद्र को पुन: उनकी शक्ति और सिंहासन प्राप्त हो गया। कथा का मूल भाव यही है कि सम्पन्नता अपने साथ असंख्य दुर्गुण ले कर आती है। अत: अधिक धन, पद-प्रतिष्ठा या सम्मान प्राप्त होने के बाद मनुष्य को अधिक सतर्क हो जाना चाहिए, ताकि उससे कोई अपराध न हो जाए। अन्यथा अचानक बढ़ी प्रतिष्ठा उसके व्यक्तित्व को बदल देती है और वह अपने मूल स्वभाव को भूल कर पुन: पतन की ओर बढऩे लगता है।
(लेखक पौराणिक पात्रों और कथानकों पर लेखन करते हैं)
Published on:
19 May 2021 08:46 am
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