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Patrika Opinion: सजा जरूरी ताकि सेना की बनी रहे पवित्रता

सेना के जवान अपनी जान देकर भी नागरिकों की हिफाजत करते हैं पर यदि फर्जी मुठभेड़ों में नागरिकों के मारे जाने की बात सामने आती रही तो सेना से लोगों का विश्वास उसी तरह उठ जाएगा, जैसे पुलिस से उठा हुआ है।

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Patrika Desk

Mar 09, 2023

Patrika Opinion: सजा जरूरी ताकि सेना की बनी रहे पवित्रता

Patrika Opinion: सजा जरूरी ताकि सेना की बनी रहे पवित्रता

सैन्य अदालत ने जम्मू-कश्मीर में तैनात राष्ट्रीय रायफल्स के कैप्टन को फर्जी मुठभेड़ में तीन युवकों को मार डालने का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा देने की सिफारिश की है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि, नियमानुसार सजा देने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी अभी बाकी है, फिर भी कोर्ट मार्शल की इस कार्यवाही से आम नागरिकों में सेना के प्रति सम्मान बढ़ेगा। सेना के जवान अपनी जान देकर भी नागरिकों की हिफाजत करते हैं पर यदि फर्जी मुठभेड़ों में नागरिकों के मारे जाने की बात सामने आती रही तो सेना से लोगों का विश्वास उसी तरह उठ जाएगा, जैसे पुलिस से उठा हुआ है। जाहिर है कि इस भरोसे को कायम रखना सेना की बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

यह मामला जम्मू के राजौरी जिले का है। 18 जुलाई 2020 को स्थानीय निवासी इम्तियाज अहमद, अबरार अहमद और मोहम्मद इबरार को अमशीपोरा में आतंकी बताकर मार डाला गया था। जब मामले ने तूल पकड़ा तो सेना ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए। प्रथम दृष्टया साक्ष्य सबित कर रहे थे कि यह मुठभेड़ फर्जी थी। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी इस मामले में एसआइटी गठित की थी और मारे गए युवकों को स्थानीय निवासी करार देते हुए यहां तक कहा था कि 20 लाख की इनामी राशि हासिल करने के लिए गलत सूचना दी गई थी। कैप्टन ने एक ही परिवार के तीन युवकों को घर से उठाया था। बाद में फर्जी मुठभेड़ को अंजाम दिया गया था।

यह पहला मामला नहीं है जब सैन्य अदालत ने किसी अधिकारी को अनुचित कार्रवाई के लिए दोषी माना हो। चर्चित माछिल कांड में सैन्य अदालत ने सेना के छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, पर आम्र्ड फोर्स ट्राइब्यूनल ने 2017 में सजा को निलंबित कर दिया। इसी तरह असम में फर्जी मुठभेड़ (1994) की जांच के बाद 2018 में सात सैनिकों को उम्रकैद की सजा देने की सिफारिश की गई थी, पर सेना ने अपनी ही अदालत की सिफारिशों को नहीं माना। इसमें कोई शक नहीं कि जम्मू-कश्मीर हो या पूर्वोत्तर, उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम देना आसान नहीं है। क्योंकि, आम तौर पर अतिवादियों को स्थानीय समर्थन मिलता रहा है। इसी कठिनाई के कारण सेना को अफस्पा जैसे कानून के तहत कुछ विशेष छूट मिलती है। पर इसका यह मतलब भी नहीं कि इस कानून का दुरुपयोग किया जाए। ऐसी फर्जी कार्रवाइयों ने ही अफस्पा को विवादास्पद बना दिया है।