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- अतुल कौशिश, वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी में गंगा नदी के 84 घाटों की सैर कराने के लिए सरकार ‘लक्सरी लाइनर’ क्रूज की सेवाएं शुरू करने की तैयारी में है। इसका किराया 750 रुपए व जीएसटी लगेगा। पर गौर करने लायक बात यह है कि 30 साल में हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद गंगा प्रदूषित ही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंगा नदी पर जगह-जगह प्रदूषण बताने वाले लाल निशान लगा दिए हैं।
पिछले पांच दशक से गंगा पर दबे पांव एक और खतरा मंडरा रहा है और वह है विकिरण का। यह विकिरण का खतरा उस परमाणु यंत्र से है जो भारत-अमरीका संयुक्त अभ्यास के दौरान बर्फ के तूफान में कहीं खो गया था। भारत-अमरीका उस वक्त हिमालय में परमाणु शक्ति सेंसर लगाकर चीन के नवोदित परमाणु कार्यक्रम पर हिमालय की ऊंचाई से जासूसी कर रहे थे।
वस्तुत: गंगा तब तक प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकती, जब तक इसके किनारे बसी आबादी कुछ कम न हो जाए और गंगा के पानी में कपड़े धोने, जानवरों को नहलाने व औद्योगिक अपशिष्ट प्रवाहित करने जैसी गतिविधियों पर रोक नहीं लगती। प्रदूषण और उस पर भी विकिरण का खतरा मानव स्वास्थ्य के लिए दो गुना हानिकारक है। हालांकि विकिरण के खतरे को पूर्णत: झुठलाने के प्रयास बेकार साबित हुए हैं।
पिछले तीन सालों से लगातार उस परमाणु यंत्र को ढूंढऩे के प्रयास चल रहे हैं जो सीआइए ने दिया था। यह 1965 में भारत-पाक युद्ध के वर्ष में नन्दा देवी में आए बर्फीले तूफान के बीच कहीं खो गया था। हाल ही एक साक्षात्कार में भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त कैप्टन मनमोहन सिंह कोहली ने कहा था कि सैकड़ों साल तक अस्तित्व में रहने वाले इस यंत्र से विकिरण का खतरा नहीं है। कोहली ने 1960 में नंदा देवी में भारत-अमरीका अभियान का नेतृत्व किया था। परंतु साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नई तकनीक की मदद से उस परमाणु यंत्र को ढूंढऩे के प्रयास करने चाहिए ताकि इस संबंध में आशंकाओं को निर्मूल साबित किया जा सके।
कुछ ऐसी मशीनें हैं जो हिमालय की बर्फ में से आर-पार हो सकती हैं। भारत चाहे तो सीआइए की साझेदारी में ये उपकरण खरीद सकता है, उसे यह याद दिलाना होगा कि जासूसी अभियान समाप्त होने पर उक्त खोया हुआ यंत्र अमरीका द्वारा वापस लेना तय हुआ था। ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि यह आशंकाएं खत्म हो जाएं कि एक खोए हुए परमाणु यंत्र से गंगा में कोई प्रदूषण हो सकता है।

