3 दिसंबर: संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की आज जयंती
ओम बिरला
लोकसभा अध्यक्ष
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दुनिया के सबसे विशाल और प्राच्य लोकतंत्र भारत ने इस वर्ष अपनी स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे किए हैं। इन 75 वर्षों में जो उपलब्धियां भारत ने हासिल की हैं वे हमारे स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों पर आधारित हैं। और, उन्हीं मूल्यों पर आधारित है, भारत का संविधान जो हर मुश्किल घड़ी में हमें अंधेरे में रोशनी की तरह राह दिखाता रहा है।
देश के सबसे मेधावान लोगों से मिलकर बनी संविधान सभा ने करीब 3 वर्ष में भारत के लिए संविधान का निर्माण किया था। हमारी उस संविधान सभा के अध्यक्ष थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद। एक स्वाधीनता सेनानी, समाज सुधारक, संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सादगी, समर्पण और सरलता की प्रतिमूर्ति थे। वे अद्वितीय प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे। उनका सारा जीवन नि:स्वार्थ भाव से अपने राष्ट्र और उसके लोगों के लिए समर्पित रहा। जिम्मेदारी और निष्ठा के साथ उन्होंने संविधान सभा की अध्यक्षता की, तथा अपनी अद्भुत प्रतिभा से संविधान सभा का कुशल संचालन करते हुए राष्ट्र को मार्गदर्शक संविधान सौंपा।
लोकतंत्र की एक खासियत है कि यह सबको साथ लेकर चलता है। राजेन्द्र बाबू भी सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे। उनका पूरा व्यक्तित्व ही समावेशी था। परिस्थितियों से तालमेल बैठाने में राजेन्द्र बाबू को महारथ हासिल थी। इसका ही असर है कि संविधान सभा में वे भाषा जैसे जटिल मुद्दे पर एकराय बनाने में कामयाब रहे। हमारा तिरंगा हमारी आन-बान-शान का प्रतीक है। हमारे राष्ट्रीय ध्वज को संवैधानिक स्वीकृति दिलाने में राजेन्द्र बाबू की बड़ी भूमिका रही। राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत को संवैधानिक मान्यता दिलाने में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। अद्भुत योग्यता और सामथ्र्य के बावजूद उन्होंने कभी पद का मोह नहीं किया। देश के लिए जितना बन सकता था किया लेकिन जीवन में कभी भी स्वयं को प्रचारित नहीं किया। कानून में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने के बाद अपनी शिक्षा का उपयोग उन्होंने देश और असहाय आमजन की सहायता के लिए किया। इसके बाद स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हों, संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में हों या फिर राष्ट्रपति की भूमिका में, उनका दृष्टिकोण सदा ही नागरिक केंद्रित रहा।
बिहार के चंपारण में नील के किसानों का आंदोलन, जो भारत में महात्मा गांधी के सत्याग्रह का प्रथम सरल प्रयोग माना जाता है। चंपारण के उस सत्याग्रह में राजेन्द्र बाबू महात्मा गांधी के प्रमुख सहयोगी थे। उन्होंने तब किसानों की दुर्दशा के बारे में लिखा और पूरे आंदोलन में कृषकों के अधिकार के लिए संघर्ष किया।
बाबू राजेन्द्र प्रसाद का एक निबंध है, ‘भारतीय संस्कृति।’ इस निबंध में वे बताते हैं कि हमारे देश में रहन-सहन की विभिन्नता है। अलग-अलग भाषाएं और वेशभूषा है, लेकिन फिर भी उसमें एकता के दर्शन होते हैं। आज आजादी के अमृतकाल में हम एक बार फिर इसी एकता के भाव को समझने और नई पीढ़ी को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी विविधरंगी संस्कृति के रंगों के पीछे भी एक ही भाव है। एकता का भाव-एक भारत का भाव। विभिन्न भाषा, जाति और धर्म की मणियों को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली हमारी भारतीय संस्कृति विशिष्ट है। गंगा-यमुना हो या कृष्णा-कावेरी, ब्रह्मपुत्र हो या नर्मदा, ये सब सिर्फ नदियां ही नहीं है बल्कि हमारी संस्कृति की प्रतीक हैं। ये सिर्फ जलधाराओं की वाहक नहीं हैं। हमारी ये सदानीरा नदियां हजारों-लाखों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक विविधता और एकता का वाहक हैं। इन जीवनदायिनी नदियों ने हमारी संस्कृति को गढ़ा है, समृद्ध किया है। भारत की लोककलाएं भी हमारी बहुरंगी संस्कृति को जोड़ती हैं। इन कलाओं ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत किया है। बाबू राजेन्द्र प्रसाद सदा इसी बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते रहे। सही मायने में उन्होंने भारत को इसी बुनियाद पर गढऩे की कोशिश की।
आजादी के 75 वर्षों में हमने कई मोर्चों पर प्रगति की है। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि हमने भारतीयता के भाव को जीवित रखा है। हमने अपनी संस्कृति और विविधता को समृद्ध किया है। भौतिक प्रगति तो दुनिया के कई देशों ने की है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ भौतिक प्रगति ही सब-कुछ नहीं होती। अपनी संस्कृति से जुड़ाव, आध्यात्मिक उपलब्धि तथा मानवता के लिए अगाध प्यार भारत की वह विरासत है, जिस पर हमें गर्व है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ हम भारतीय पूरी दुनिया को ही अपना परिवार मानते हैं। हर मनुष्य के आंसू पोंछना हमारा धर्म है। ऐसी सोच भारतीयता की बुनियाद में है। दुनिया में ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) की अवधारणा कुछ दशकों पहले की बात है, लेकिन भारतीय संस्कारों ने तो सदियों से ही पूरी दुनिया को अपना परिवार माना है। बाबू राजेन्द्र प्रसाद इसी भारतीयता के प्रतीक रहे हैं। राजेन्द्र बाबू ने एक जगह कहा था कि किसी की गलत मंशा आपको किनारे नहीं लगा सकतीं। भारत की आजादी के बाद दुनिया की कुछ ताकतें इंतजार कर रही थीं कि भारत कब टूटे, नाकाम हो! कुछ को लगता था कि भारत कुछ साल में ही बिखर जाएगा, यहां लोकतंत्र कायम नहीं रह पाएगा। लेकिन भारत अपनी पूरी क्षमता और सामथ्र्य से, भारतीयता की अटूट भावना से लगातार आगे बढ़ता गया।
स्वाधीन भारत की इन 75 वर्षों की यात्रा में हमारे देश में 17 आम चुनाव हुए, 300 से ज्यादा विधानसभा चुनाव और सैकड़ों नगर निकाय एवं पंचायत के चुनाव हुए हैं। हर चुनाव के बाद हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली और अधिक मजबूत और समृद्ध हुई है। हमारी निर्वाचन प्रणाली पर आम देशवासियों का भरोसा बढ़ा है। स्वाधीनता के साथ ही भारत ने संसदीय लोकतंत्र के जिस स्वरूप को अपनाया था, हमने अपने आचरण से न सिर्फ संसदीय लोकतंत्र को श्रेष्ठ साबित किया, बल्कि हमने यह भी साबित कर दिया है कि भारत का लोकतंत्र विश्व में सबसे जीवंत लोकतंत्र है। हमारी इस भावना के पीछे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी जैसे महान व्यक्तित्वों की प्रेरणा काम करती रही है।
एक समय था जब हमारे देश में अन्न का अभाव था। आज देश अन्न का रेकॉर्ड उत्पादन कर रहा है। आज भारत दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। चाहे स्टार्ट-अप का क्षेत्र हो, या अंतरिक्ष का क्षेत्र हो, खेती-किसानी से लेकर, उद्योग-उत्पादन, संचार और सूचना से लेकर सर्विस सेक्टर तक, आज हर क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। हमारा देश अपने आत्मबल से आत्मनिर्भर बन रहा है। बाबू राजेन्द्र प्रसाद जैसे मनीषियों के दिखाए रास्ते पर, उनके बनाए संविधान के आदर्शों पर चलते हुए भारत निरंतर प्रगति कर रहा है।
राष्ट्रपति रहते हुए राजेन्द्र प्रसाद जी ने कहा था कि, मंजिल को पाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए याद रहे कि मंजिल की ओर बढ़ता रास्ता भी नेक हो। साधन और साध्य की पवित्रता का यही संदेश महात्मा गांधी जी ने भी दिया था। इन साढ़े सात दशकों में भारत की यात्रा को देखें तो महात्मा गांधी और बाबू राजेन्द्र प्रसाद के इन आदर्शों को आत्मसात कर हमारा देश नेक रास्ते पर नेक विचारों के साथ आगे बढ़ा है। चाहे आर्थिक मोर्चा हो, वैज्ञानिक या फिर सामरिक हमने अपनी राह खुद बनाई है। हम अपने ढंग से अपने मूल्यों के साथ लगातार आगे बढ़ रहे हैं।
राजेन्द्र बाबू का व्यक्तित्व विनम्रता, सरलता और सादगी का मानक था। जिसके कारण उन्हें जो प्रतिष्ठा प्राप्त थी, वह बहुत कम लोगों को प्राप्त हुई है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होने के बाद भी उन्होंने कभी भी इन गुणों का त्याग नहीं किया।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बारे में महात्मा गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि, राजेन्द्र बाबू सबसे बेहतर साथी हैं, जिनके साथ मैंने काम किया। उनके स्नेह ने मुझे उन पर इतना निर्भर कर दिया है कि अब उनके बिना मैं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।
विविधता से परिपूर्ण लोकतांत्रिक देश में लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा कैसा हो, सभी व्यक्ति और वर्ग का सार्वभौमिक विकास किस प्रकार हो, सरकार को कैसा होना चाहिए, आमजन का देश के प्रति दायित्व, विकास की बेहतर राह कौन-सी हो और हम विश्व को क्या संदेश दें! इस तरह के अनेक विषयों पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने अपने विचार रखे हैं। आज जरूरत है कि देश की युवा पीढ़ी राजेन्द्र बाबू के विचारों को पढ़े, समझे और उन्हें अपने जीवन में उतारे।
मानवीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति के अनुसार सक्षम भारत का निर्माण करना राजेन्द्र बाबू का ध्येय था। वह ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें भेदभाव और ऊंच नीच का भाव दूर-दूर तक नहीं हो। एक तरह से उनका भी सपना था, एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण। आइए हम इसी दिशा में आगे बढ़ें। आज बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी की जयंती पर उनका स्मरण करते हुए सभी देशवासियों को शुभकामनाएं देता हूं।