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कर्म और प्रवृत्तियों का विश्लेषण, अंतर्मन की यात्रा पर जोर,‘बाहर प्रवृत्ति, भीतर निवृत्ति’ पर प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख -‘बाहर प्रवृत्ति, भीतर निवृत्ति’ पर प्रतिक्रियाएं...

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Gulab Kothari Editor-in-Chief of Patrika Group

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Reaction On Gulab Kothari Article :
वृत्ति में अविद्या के आवरण जुडऩे से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं की ओर ध्यान इंगित करते हुए इनसे न जुडऩे देने की सलाह देते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ‘शरीर ही ब्र’ के आलेख ‘बाहर प्रवृत्ति, भीतर निवृत्ति’ को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उन्होंने कहा है कि लेख में कर्म और प्रवृत्तियों का अच्छा और सार्थक विश्लेषण है। यह बताता है कि अंतर्मन की यात्रा ही ब्रह्मांड को जानने, समझने का सही तरीका है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से...


यह बात सही है कि जीवनयापन में कर्म की महत्ता है। लेकिन व्यक्ति को जैसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, उसके मन में कई तरह के कार्य करने की प्रवृत्तियां उठने लगती हैं। मनुष्य अपना व्यवहार भी इसी के मुताबिक रखने लगता है।
लादू सिंह, हनुमानगढ़

आलेख में मनुष्य व उसके मन की व्याख्या की गई है। निश्चित तौर पर मनुष्य दुनिया में हर तरह का व्यवहार करता है लेकिन जब मन से सोचता है तो उससे गलत सही का ज्ञान भी होता है।
मोहनलाल , हनुमानगढ़ जंक्शन

वर्तमान समय में इंसान धर्म— कर्म व संस्कारों को बिलकुल ही भूल गया है। बस मोह माया भोग विलास छल कपट और गलत कार्यों में रुचि ज्यादा हो गई है। भौतिक सुविधाओं और काल्पनिक विचारों में ही उलझ कर रह गया है। गलत तरीके से धन उपार्जित कर रहा है। हर इंसान को सत्य निष्ठा व ईमानदारी से धन अर्जित कर जीवनयापन करना चाहिए।
सुनील जैन, जयपुर

विज्ञान वार्ता में "बाहर प्रवृत्ति-भीतर निवृत्ति" आलेख में वर्तमान जीव के कर्म का सटीक विश्लेषण किया गया है। संसार में जीव को उसके अच्छे बुरे कर्मों और गुणों के आधार पर ही 84 लाख योनियों से गुजारना पड़ता है। वर्तमान समाज में लोगों के स्वभाव के बाहरी स्वरूप में कई परिवर्तन दिखाई दे रहे है।
चंपालाल गहलोत, जोधपुर

यह सच है व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ होता है। लेकिन यदि धर्म आधार हो तभी व्यक्ति सफलता के शिखर को छू सकता है। बिना धर्म के न तो जागरण सम्भव है और न ही स्वयं का स्वरूप-ज्ञान सम्भव है। धर्म बिना तो मनुष्य पशु समान ही है।
मदनलाल लिम्बा, जोधपुर

वस्तुत: कर्म के प्रति प्रवृत्ति या निवृत्ति अविद्या के कारण होती है। शरीर यात्रा के लिए प्रकृति जनित गुणों के कारण मानव की कर्म के प्रति प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है और उसी के कारण ही संसार का सम्पूर्ण व्यवहार चल रहा है। कर्म में पवित्रता के लिए आचरण की पवित्रता आवश्यक है। आज सिर्फ स्थूल शरीर के बनाव श्रृंगार पर सबका ध्यान है। इसी के कारण सूक्ष्म शरीर या आत्मा की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति नहीं रहती और मनुष्य भोग योनियों में भटक रहा है।
इला पारीक, बीकानेर

जीवन का सही मार्ग की ओर चलना जरूरी है। बाहरी मार्ग प्रकाश व रोशनी से प्रशस्त हो सकता है लेकिन शरीर के आंतरिक प्रकाश को बनाए रखने के लिए मन और आत्मा का सदैव प्रकाशवान और ऊर्जावान बने रहना ,भीतर से जागृत रहना जरूरी है। यह सही है वृत्ति में जब अविद्या के आवरण जुड़ जाते हैं तब व्यक्ति केवल बाहर की ओर भागता है। भीतर का सब कुछ ढका रहता है। व्यक्ति खुद को देख नहीं पाता।
पंडित किशन लाल ओझा, बीकानेर

गुलाब कोठारी ने लेख में अपनी अंतरात्मा की पहचान के लिए वृत्तियों पर नियंत्रण जरूरी बताया है। मनोवृत्तियों पर नियंत्रण से ही अंतर्मुखी होकर अंतरात्मा की आवाज को सुना जा सकता है। लेख ज्ञानवर्धक और संग्रहणीय है।
सुरेश सौरभ, पन्ना

आलेख में तार्किक भाव के साथ इंसान की दिखावे की प्रवृत्ति और अंदर से अच्छे कार्य त्यागने की सोच को दर्शाया है। मनुष्य अपने भीतर के मन को मारकर लालच में झूठ-फरेब और धोखा देने से भी गुरेज नहीं करता। जीवन के महत्त्वपूर्ण अवसरों को मोह में जाया कर देता है। अंत में भी यह मोहपाश उसे खुद की अलग पहचान नहीं बनाने देता है। जीवन को फल पाने वाला समझता है और विकारों को अपनाते जाता है, जबकि जीवन का मूल तत्त्व सही प्रवृत्ति और बुरे कार्यो से निवृत्ति होना चाहिए।
वैभव जैन, इंदौर

देखा जाए तो कर्म और प्रवृत्तियों से ही व्यक्ति के जीवन को दिशा मिलती है। प्रवृत्तियां जब आंतरिक विकास करने वाली हों तो व्यक्ति का चरित्र ऊपर उठता जाता है और जब प्रवृत्तियां बाहरी गलत क्रियाकलापों में लग जाती हैं तो व्यक्ति का चरित्र भी गिर जाता है। इसलिए प्रवृत्तियों के संस्कार बचपन में ही डालना जरूरी है ।
पंडित जगदीश शर्मा, ज्योतिषाचार्य, भोपाल

लेख ने मानव जीवन के मर्म को महसूस कराया है। प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए इसमें अंदर की निवृत्ति को बेहतर ढंग से दर्शाने की कोशिश की गई है। इस तरह के आलेख समाज के लिए आवश्यक हैं।
डॉ शैलेंद्र परिहार, एमडी मेडिसिन, भिंड

समय के साथ व्यक्ति पूरी तरह से बदल गया है। आज हर व्यक्ति के जीवन का स्वरूप विकृति के मार्ग पर निकल पड़ा है। वह अपनी आत्मा की कोई बात नहीं सुनता। केवल मोह माया में फंस कर गलत पर गलत काम करता जा रहा है। इंसान बाहर से तो अच्छा बनने की कोशिश करता है, लेकिन अंदर से वह गलत कामों के लिए ही लालायित रहता है। इसलिए दिनों दिन समाज और दुनिया के हालात बिगड़ते जा रहे हैं।
राजेश पाठक, शिक्षक, शिवपुरी

माया के चक्कर में आत्मा से दूर होने की प्रवृत्ति को लेख में सटीक परिभाषित किया गया है। विकृति मार्ग पर स्थूल शरीर समाज में धन की संतुष्टि का मार्ग खोजता है। अपनी अंतरात्मा से विरक्त हो जाता है, जिसके चलते पवित्रता, शुद्धि-अशुद्धि का विवेक नहीं रह जाता है। वहीं दूसरी ओर वृत्ति ज्ञान के जरिए निवृत्ति के मार्ग पर प्रशस्त होती है। बिना धर्म के अर्थ और काम के सहारे आत्म मोक्ष संभव नहीं है।
लखनलाल असाटी, छतरपुर

लेख में शास्त्रों का निचोड़ है, जो मन, प्रवृत्ति, निवृत्ति सभी को विस्तार से समझने का अवसर दे रहा है। खासकर युवा मन को इस लेख से सीख लेनी चाहिए। सही कहा है कि जब मनुष्य के पास लक्ष्मी नहीं होती है तो वह नारायण का भक्त बना रहता है, जिनकी कृपा से उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। किंतु यहीं से उसके मन में नारायण से ज्यादा लक्ष्मी का ध्यान आने लगता है और वह नारायण से दूर होने लगता है।
वंदना सिंह ठाकुर, जबलपुर

वर्तमान परिवेश में व्यक्ति ध्यान की बजाय धन की ओर ज्यादा आसक्त हो रहा है। शरीर की आंतरिक व्यवस्था को स्वच्छ बनाने के बजाय बाहर की भौतिक सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। धन ज्यादा आने पर उसमें अहंकार बढ़ जाता है। वह व्यसन की ओर आसक्त हो रहा है। इसमें आत्मा का स्थान नहीं है। व्यक्ति ध्यान की ओर ध्यान देने लगे तो उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति होगी।
विकास दशोत्तर, ज्योतिषाचार्य, रतलाम

आलेख में कोठारी ने सत्य ही लिखा है कि धन प्राप्ति के पश्चात मनुष्य के भीतर अहंकार की भावना आ जाती है। इसके साथ ही नई इच्छाएं मन में आती जाती हैं। मनुष्य धन को बचाने और उसे और बढ़ाने के प्रयास में लग जाता है। इसके साथ ही अन्य सारे कर्म वह भूल जाता है।
राजीव सिंह परिहार, अनूपपुर

मनुष्य जीवन अच्छे कर्म करने के लिए मिला है, लेकिन सही मायने में मनुष्य पैसे के पीछे भाग रहा है। पैसा कमाने के लिए बुरे काम करने से भी नहीं चूकता है और कई व्यसन भी पाल लेता है। मनुष्य को अच्छे कर्म करना चाहिए। अपने जीवन को धर्म-कर्म के कार्य में लगाना चाहिए। परोपकार करना चाहिए, जिससे कि जीवन मृत्यु के चक्कर से छुटकारा प्राप्त हो सके।
विशाल मिश्रा, बैतूल

हर व्यक्ति बाहरी आवरण को तो जीता है लेकिन खुद के अंदर कभी झांककर भी नहीं देखता। अंतर्मन की यात्रा ही ब्रह्मांड को जानने, समझने का सुगम तरीका है। आलेख यह भली भांति स्पष्ट करता है कि जब तक हम भीतर की यात्रा नहीं करेंगे स्थिर नहीं हो पाएंगे। मोह, माया में उलझा व्यक्ति आत्मा से कैसे दूर हो रहा है, इसे भी अच्छी तरह से समझाने का प्रयास आलेख में हुआ है। गीता, उपनिषद भी यही कहते हैं कि अंतर्मुखी हो जाएं तो बाहरी प्रवृत्तियों से छूटकर आत्मा की अनंत यात्रा की जा सकती है।
जयपालसिंह पंवार, सनावद (खरगोन)

स्वयं के लिए किए जाने वाले कर्मों के पीछे का उद्देश्य मनुष्य की कामना होती है। कामनाओं का स्वरूप असीमित होता है, यह सब जानते भी हैं। फिर भी कामनाओं के मोहपाश में आकर अपने जीवन के मूल उद्देश्यों से भटक जाते हैं और अलग ही राह पर चलने लगते हैं। ऐसे में भौतिक सुख तो मिलता है, लेकिन आत्मीय खुशी व शांति जो मनुष्य जीवन मे सबसे जरूरी है वो नही मिल पाती। पूरा जीवन उसी की तलाश में गुजर जाता है। हम अपने आश्रम में गुरुजन के ऐसे ही प्रवचन से अवगत कराकर मन की शांति और आत्मीय सुख का रास्ता बताते हैं। आश्रम में कोई भी शामिल हो सकता हैं। ये निशुल्क है।
मुकेश मेश्राम, बालाघाट

माया इंसान से बहुत कुछ करवाती है, यही कारण है कि जिंदगी भर वो इसी में उलझा रहता है। गीता में कर्मों को प्रधानता दी गई है। व्यक्ति के कर्म ही उसे आगे लेकर जाते हैं,लेकिन हर वृत्ति के साथ उसके मन की चंचलता भी बढ़ती चली जाती है। कई बार अविद्या भी इंसान को गलत रास्ते पर ले जाती है।
गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर