
indira gandhi
- अभिषेक मनु सिंघवी, विधिवेत्ता और राजनेता
आलोचना जब विकृत और अतिरंजित हो जाए, तो लोग आलोचक की नीयत पर शक करने लगते हैं। खासकर जो आलोचक एक संतुलित बुद्धिजीवी दिखने की चाह रखता हो यदि वह अतिवादी शब्दावली अपना ले तो उसकी नीयत पर सवाल और मुखर हो उठते हैं। लंबे समय से तमाम गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस दल आपातकाल की आलोचना मुखर ढंग से करते रहे हैं। दशकों से कई दल कांग्रेस की भत्र्सना के लिए आपातकाल की बरसी का इस्तेमाल करते आए हैं। इनमें बीजेपी के वह आला नेता भी शामिल हैं, जिन्होंने आपातकाल पर केंद्रित तीन टिप्पणियों की शृंखला फेसबुक पर लिखी है।
सवाल उठता है कि इससे पहले उनके समेत किसी ने भी आज तक इंदिरा गांधी की तुलना हिटलर से क्यों नहीं की? कहीं यह नागपुर और उसके मशहूर प्रचारक की ओर से फेंका गया एक और ब्रह्मास्त्र तो नहीं, जो रोजगारविहीन वृद्धि, गिरती लोकप्रियता, उपचुनावों में हार और सनक भरे भाषणों व खोखले वादों से लोगों में पैदा हो रहे मोहभंग से ध्यान बंटाने के लिए 2019 के चुनाव से पहले माहौल को गरमाने की कोशिश हो? कहीं यह बीजेपी की पहली बहुमत वाली सरकार (और संभवत: आखिरी) के रहते ही नेहरू-गांधी का जिक्र किए बगैर इतिहास की नई पाठ्यपुस्तकों को लिख डालने की बेचैनी तो नहीं? संभव है कि यह कॅरियर में तरक्की पाने की घटिया तरकीब ही हो।
मैंने दशकों पहले ‘स्टेट्स ऑफ इमरजेंसी’ के तुलनात्मक कानूनी पहलुओं पर शोध प्रबंध लिखा था। आपातकाल के उस दौर में कई लोगों के मुकाबले मैंने कानूनी नजरिए से कहीं ज्यादा आलोचना की थी। हर महान व्यक्ति को समग्रता में देखा जाना चाहिए। कोई नहीं कह रहा कि इंदिरा गांधी दोषमुक्त थीं। वे अपने दौर की पैदाइश थीं और कई मोर्चों पर उन्होंने खुद को घिरा हुआ पाया। बेशक उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए जो खुद को बचाने के लिए थे और गलत थे। इमरजेंसी तो बहुत बड़ी गलती थी। मेरे खयाल से ऐसे फैसले मोटे तौर पर एक झटके में लिए गए और दूसरों की गलत कानूनी सलाह की देन रहे।
एक अस्थायी विक्षेप का सरलीकरण कर के उसे हिटलर तक ले जाना हालांकि उर्वरतम कल्पनालोक की ही देन हो सकता है। इमरजेंसी पर लिखी शृंखला की भाषा बताती है कि हिटलर असल में एक बुरा पात्र था, जो कि वह था। छात्र राजनीति में आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के प्रमुख के बतौर उनके प्रतिष्ठित अतीत के मद्देनजर मुझे अचरज होता है कि आखिर आधी सदी से ज्यादा समय तक लेखक ने गुरु गोलवलकर और वीर सावरकर के निम्न ‘धन्य’ वचनों की - विरोध तो छोड़ दें - आलोचना तक क्यों नहीं की। ‘वी एंड आवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ में गोलवलकर लिखते हैं, ‘जर्मनी ने हमें यह भी दिखाया है कि अलग-अलग नस्लों और संस्कृतियों को एक इकाई में समाहित करना कितना असंभव काम है, हिंदुस्तान में हमारे लिए यह एक कारगर सबक है...।’ सावरकर लिखते हैं, ‘नाजीवाद ने जर्मनी को बचा लिया... यह मानने का कोई कारण नहीं कि हिटलर चूंकि नाजी है इसलिए वह शैतान होगा... जर्मनी के लिए सबसे उपयुक्त क्या होगा, इसे पंडित नेहरू से बेहतर हिटलर समझता है...।’
दुनिया में ऐसे तमाम लोकतांत्रिक नेता हुए हैं जिन्होंने गलतियां की हैं लेकिन हिटलर का ठप्पा किसी पर नहीं लगा। हिटलर ने साठ लाख लोगों को मरवाया था। बेहद तंग दिमाग और तंगदिल आदमी भी हिटलर से किसी की तुलना नहीं करेगा। हिटलर ने निरंकुश सत्ता हाथ में आने के बाद पीछे मुडक़र नहीं देखा। इसके उलट इंदिरा गांधी ने 1977 में चुनाव कराकर लोकतांत्रिक जवाबदेही का ‘हिटलरी’ ब्लंडर कर डाला। इंदिरा चौथी बार लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर वापस आईं। जब 1984 में राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर उन्हें अमृतसर में अतिवादी कदम उठाना पड़ा, तो वे पीछे नहीं हटीं। इसी की वजह से उनकी जान गई। खुद को अमर करने के लिए संविधान संशोधन का हिटलरी रास्ता अपनाने का जो आरोप उन पर मढ़ा जाता है, अपने सोलह साल के प्रधानमंत्रित्व काल में उन्हें इससे साल भर का भी लाभ नहीं मिला। आज भी दूरदराज के गांवों-कस्बों में ‘इंदिरा अम्मा’ का नाम किसी के भी मुकाबले कहीं ज्यादा गौरव और स्वत्व की भावना का पर्याय है।
कानूनी राज्यतंत्र और संस्थागत ढांचे के भीतर अघोषित के बजाय घोषित आपातकाल कहीं ज्यादा जवाबदेह कृत्य है, लेकिन आज भय का बोध कहीं ज्यादा सघन है। ‘झुकने को कहा तो रेंगने लगे’ वाला आडवाणीजी का चर्चित उद्धरण चार दशक पहले के मुकाबले आज कहीं ज्यादा दृश्य है। जिन्हें यह सब नहीं दिख रहा और जो आपातकाल की सालगिरह मनाने के नाम पर 34 साल पहले गुजर चुकी प्रधानमंत्री को बदनाम कर रहे हैं, उन्हें कौन समझाए। असुरक्षाबोध से ग्रस्त मौजूदा सत्ता के शुतुरमुर्गी आचरण के अलावा इसे और क्या कहा जाए? वाजपेयी ने इंदिरा को ‘दुर्गा’ कहा था और इमरजेंसी के बाद भी इतने साल तक उन्होंने इस पर पलटकर नहीं सोचा। जाहिर है, आज उनके जितने कद का कोई है भी तो नहीं।

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