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प्लास्टिक कचरे की जिम्मेदारी तय हो

ऑस्ट्रेलिया की एक शोध रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि 90 फीसदी प्लास्टिक कचरा सौ कंपनियां तैयार कर रही हैं। ऐसी ज्यादातर कंपनियां एशिया, यूरोप, अमरीका जैसे महाद्वीपों में स्थापित हैं।
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प्लास्टिक कचरे की जिम्मेदारी तय हो

प्लास्टिक कचरे की जिम्मेदारी तय हो

दुनिया की 20 कंपनियां 50 फीसदी से अधिक सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे के लिए जिम्मेदार हैं। ऑस्ट्रेलिया की एक शोध रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि 90 फीसदी प्लास्टिक कचरा सौ कंपनियां तैयार कर रही हैं। ऐसी ज्यादातर कंपनियां एशिया, यूरोप, अमरीका जैसे महाद्वीपों में स्थापित हैं। ये कंपनियां उत्पादन और उत्सर्जन से होने वाले पर्यावरणीय संकट के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं। सब जानते हैं कि दुनिया में प्रदूषण का एक सबसे बड़ा कारक इस समय सिंगल यूज प्लास्टिक है। इसके जरिए लगातार प्लास्टिक कचरा बढ़ रहा है। यह जमीन से लेकर समुद्र तक को प्रभावित कर रहा है। हाल ही में तौतके तूफान के दौरान भी इस तरह का प्लास्टिककचरा समुद्र ने उगला है, जिसका ढेर तटीय क्षेत्रों पर लग गया है। इसने साफ संदेश दिया है कि हमें कचरे के उत्सर्जन और उसके निष्पादन के बारे में नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सिंगल यूज प्लास्टिक का एक लाख टन कचरा हर महीने समुद्र में जाता है। यह न केवल जलीय जीवों के लिए संकट खड़ा कर रहा है, बल्कि समुद्र के भीतर भी इकोलॉजी सिस्टम को खराब कर रहा है। इस कचरे के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसका दोबारा उपयोग महज दस फीसदी तक ही संभव है, जबकि 90 फीसदी हमेशा कचरे के तौर पर लाखों साल तक पृथ्वी पर ही शेष रह जाता है। यह बड़ी समस्या है। ऐसे में जरूरत जागरूकता की है, ताकि इसे रोका जा सके।

हालांकि दुनिया भर में भारत की पहल की तारीफ भी हो रही है। भारत ने सिंगल यूज प्लास्टिक के उत्पादन, उत्सर्जन से लेकर उसके निष्पादन के बारे में नई पॉलिसी बनाई है। इसके तहत इसके उपयोग को लगातार सीमित किया जा रहा है। कोशिश यही है कि इसे पूरी तरह से कम कर दिया जाए। इससे निर्भरता कम होते ही इस कचरे के निष्पादन की जरूरत भी कम हो जाएगी। ऐसे में इससे होने वाले नुकसान भी एक हद तक कम हो जाएंगे। भारत जैसे प्रयास विकसित देशों को तेजी के साथ करने चाहिए। इन बड़ी कंपनियों के प्रभुत्व को रोकने की क्षमता विकासशील देशों से ज्यादा विकसित देशों के पास है। ऐसे में अगर कंपनियों की नीतियों में फेरबदल होगा, तो इस कचरे को प्रभावी तरीके से रोका जा सकेग। इसके वैज्ञानिक तौर पर निष्पादन की जिम्मेदारी कंपनियों की होनी चाहिए। जब तक पूरी दुनिया मिलकर प्रयास नहीं करेगी, तब तक यह कचरा पर्यावरण के लिए खतरनाक बनकर सामने आता रहेगा।