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पुस्तक समीक्षा : फिर से लौटना होगा मूल वाल्मीकि रामायण की ओर

'ब्लूम्सबरी' से प्रकाशित 'रामायण अनरेवेल्ड' में लेखिका उचित ही कहती हैं द्ग 'अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी राम आत्मसंयम, प्रेम, संवेदनशीलता और उदारता के प्रतीक हैं, जिनकी कहानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ की शिक्षा देती है।'

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Patrika Desk

Jul 24, 2022

पुस्तक समीक्षा : फिर से लौटना होगा मूल वाल्मीकि रामायण की ओर

पुस्तक समीक्षा : फिर से लौटना होगा मूल वाल्मीकि रामायण की ओर


राजेंद्र बोड़ा
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक
और पुस्तक समीक्षक

वेदव्यास की महाभारत और वाल्मीकि की रामायण दो ऐसे महाकाव्य हैं, जो कब लिखे गए, इसका किसी को ज्ञान नहीं है। दो से चार हजार साल की गणना भी उनका काल बताते समय कम लगती है। इसीलिए वे भारतवर्ष की सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। महाभारत की गाथा युद्ध में अधर्म पर धर्म की विजय की है। रामायण में भी युद्ध है, मगर वह उसके केंद्र में नहीं है। रामायण के केंद्र में मर्यादा है। आचरण की मर्यादा। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मूल कथा महर्षि वाल्मीकि ने त्रेता युग में तब लिखी जब ब्रह्मदेव ने वाल्मीकि को आशीर्वाद देते हुए कहा कि 'तुम जो कथा कहोगे उसका एक भी शब्द असत्य नहीं होगा और धरती पर जब तक पर्वत खड़े रहेंगे तथा नदियां बहती रहेंगी, वह कथा रहेगी।' अलग-अलग काल खंडों में लोग अपने-अपने नजरिए से राम की गाथा कहते रहे हैं। यह अतुलनीय भारतीय मेधा ही है, जो मूल सत्य को सुरक्षित पकड़े रख कर पुरानी गाथा को नए-नए रूप में प्रस्तुत करती रहती है। इसीलिए हम रामकथा को अलग-अलग दृष्टियों और धारणाओं के साथ सुनते और पढ़ते आए हैं।
प्रबंधकीय विशेषज्ञ अमी गनात्रा ने रामकथा को नए संदर्भों में फिर से कहने की बजाय अपनी नई पुस्तक 'रामायण अनरेवेल्ड' में वाल्मीकि की रामायण को मूल रूप में रखने का प्रयास किया है। इससे पहले वे वेदव्यास के महाकाव्य पर 'महाभारत अनरेवेल्ड' लिख चुकी हैं। रामायण में राम का चरित्र पुत्र, भाई, पति, सखा और राजा जैसी अनेक भूमिकाओं में है। राम हर भूमिका के धर्म की, या कहें कत्र्तव्य की, इस प्रकार मर्यादा निभाते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम हो जाते हैं। 'ब्लूम्सबरी' से प्रकाशित 'रामायण अनरेवेल्ड' में लेखिका उचित ही कहती हैं ; 'अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी राम आत्मसंयम, प्रेम, संवेदनशीलता और उदारता के प्रतीक हैं, जिनकी कहानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ की शिक्षा देती है।'
गनात्रा के लेखन में उनकी दृष्टि वैसी ही भक्ति और श्रद्धा भाव की है, जो 'गीताप्रेसÓ के प्रकाशनों में मिलती है। उनकी दृष्टि में 'रामायण केवल एक कहानी नहीं है, वह हमारा इतिहास है।' मूल रामायण पर फिर से लौटने के बारे में वे कहती हैं कि 'वाल्मीकि द्वारा कही गई गाथा पर फिर से लौटना आवश्यक है, ताकि हम रामायण के चरित्रों के बारे में बेहतर धारणा बना सकें, क्योंकि धर्म वह आधार है जो किसी समाज को स्थायित्व प्रदान करता है।' वे कहती हैं, 'हम रामायण के बारे में उतना ही जानते हैं, जो हमने उसके पुनर्कथन या उसकी व्याख्याओं में पढ़ा या सुना है।' परंतु अपनी पुस्तक में वे वाल्मीकि रामायण के इतिहास का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं करतीं, केवल उसका सरलीकरण करते हुए मूल ग्रंथ के कथाक्रम और चरित्रों की स्थूल जानकारी देती हैं।
लेखिका गनात्रा ने आर्थिक सफलता के सोपान चढ़ती भारत की नई पीढ़ी, जिसे अपनी सनातन संस्कृति के इतिहास की कोई स्मृति नहीं है और जिसकी रामायण की जानकारी उतनी झलक तक ही सीमित है जो उसे डिजिटल मंच पर मल्टीमीडिया या कॉमिक्स से मिलती है, पर उपकार किया है, उनमें अपने इतिहास के वैभव की स्मृति जगाई है।