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संतन को कहां सीकरी…

संत से सांसद बने स्वामी सुमेधानंद ने अभी दो दिन पहले ही कहा- ‘जो अधिकारी उनकी नहीं सुनते, उन्हें वे टंगवा देते हैं।’ यह कैसी भाषा है?

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Sunil Sharma

May 26, 2018

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- गोविन्द चतुर्वेदी

राजनेताओं के ऊटपटांग बोलने का फैशन सा हो गया है। जब तक वे दो-चार दिन में ऐसा कुछ न बोल लें तब तक शायद उन्हें खुद भरोसा नहीं होता कि, वे राजनेता हैं। इस मामले में सत्ताधारी दल हो या विपक्ष, दोनों के कुछ राजनेताओं को तो महारथ हासिल है। जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, वैसे ही अन्य की जुबान भी फिसलती जाती है।

संत से सांसद बने स्वामी सुमेधानंद ने अभी दो दिन पहले ही कहा- ‘जो अधिकारी उनकी नहीं सुनते, उन्हें वे टंगवा देते हैं।’ यह कैसी भाषा है? किसकी भाषा है? यह भाषा न तो लोकतांत्रिक है, न ही साधु की है। खासतौर पर सुमेधानंद जैसे संत की तो कतई नहीं हो सकती। इस अहंकारी वक्तव्य में तो जन प्रतिनिधि का भी अपमान है और साधु के चोले का भी।

आज देश में कई साधु-साध्वी हैं जो राजनीति में हैं। पहले भी रहे हैं। पहली बात तो उन सबका राजनीति में आना ही संन्यास का अपमान है। यदि समाज में ही रहना है तब ऐसे लोगों के संन्यास लेने का क्या मतलब है? निर्णय उन्हें करना हैं लेकिन राजनीति में रहना है तो साधु का चोला तो उन्हें त्याग ही देना चाहिए। सनातन परम्परा में संन्यास तो जीवन की सर्वोत्कृष्ट श्रेणी है जो जन-जन को समर्पित है। उसमें प्रेम, प्यार और करुणा है। घृणा और कड़वे वचनों के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। फिर चाहे वह सुमेधानंद हों या साक्षी महाराज, साध्वी उमा भारती हों या योगी आदित्यनाथ। सब पर यही लागू होता है। उनके जरा सा भी पटरी के उतरने से, वे ही नहीं साधु परम्परा और संत जगत कलंकित होता है। लोकतंत्र तो अपमानित होता ही है।

राजनीति से दूर रहने का फैसला तो संतों को, साधु समाज को करना है पर राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि, वे अपने लाभ के लिए उनकी तपस्या भंग करना बंद करें। ऐसी कोशिशें हमेशा से होती आई हैं। आगे भी होती रहेंगी पर अपने पर नियंत्रण संतों को ही रखना है। संत कुंभनदास का उदाहरण सबके सामने है। सम्राट अकबर से लेकर राजा मानसिंह तक ने उनकी तपस्या भंग करने की कम कोशिश नहीं की, लेकिन वे ‘श्रीनाथ जी की सेवा’ से अलग नहीं हुए। ‘संतन को कहां सीकरी सो काम’ कहकर सबको चुप करा दिया। गृहस्थ होते हुए भी संतों से बड़े साबित हुए। यही अब होना चाहिए।

अव्वल तो दल, साधु-संतों को राजनीति से न जोड़ें। संन्यास की मर्यादा भी संविधान से कम नहीं है। कम से कम उसे तार-तार न करें। ‘जन’ सत्ता तो पांच साल चुप रहती है। राजसत्ता पर नियंत्रण के लिए ‘साधु सत्ता’ की जगह तो अलग से ही बनी रहने दें। सब घालमेल हो गया तो कोई कहीं का नहीं रहेगा। ऐसे राजनेताओं जो एक-दूसरे को दो कोड़ी का बताते हों, के साथ बैठकर वे कैसा समाज बना पाएंगे, वे ही जानें।