
संस्कृति को जीवंत करने का जरिया संस्कृत
कलराज मिश्र
राज्यपाल, राजस्थान
संस्कृत भाषा मात्र ही नहीं है बल्कि भारत की गौरवमयी संस्कृति है। यह हमारी आत्मा, अस्मिता व भारतीयता के मूल से जुड़ी है। हमारे तमाम प्राचीन ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे गए। इसलिए संस्कृत को देश की प्राणभाषा कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी। हमारे यहां व्याकरण को तीसरा वेदांग कहा गया है। वेदमंत्रों को मूल रूप में सुरक्षित रखने और उनके दुरूह ज्ञान को प्रकाशित करने के उद्देश्य से जब पृथक व्याकरण शास्त्र की आवश्यकता हुई तो पुरातन ऋषिवंशों द्वारा वेदों की विभिन्न शाखाओं को लक्ष्य करके व्याकरण ग्रंथ लिखे गए। व्याकरण शास्त्र का चरम विकास पाणिनी की 'अष्टाध्यायीÓ में हुआ। वैदिक और लौकिक संस्कृत साहित्य की भाषाशास्त्रीय एकरूपता के लिए जिन नियमों और उपनियमों को इसमें संकलित किया गया, उसकी तुलना में विश्व की किसी अन्य भाषा का व्याकरण उपलब्ध नहीं। इसी 'अष्टाध्यायी ' से देश की विभिन्न भाषाओं का विकास भी हुआ।
असल में संस्कृत, विश्व की प्राचीनतम लिखित भाषा है। आधुनिक आर्यभाषा परिवार की भाषाएं यथा - हिंदी, बांग्ला, असमिया, मराठी, सिंधी, पंजाबी, नेपाली आदि मूलत: संस्कृत से ही विकसित हुई हैं। इसके साथ ही तेलुगू, कन्नड़ एवं मलयालम की भी सर्वाधिक निकटता संस्कृत से ही है। संस्कृत ने हिन्दी समेत कई भाषाओं को भी किंचित परिवर्तनों के साथ बहुत सारे शब्द दिए हैं। अहम बात यह भी है कि संस्कृत एकमात्र भाषा है जिसमें शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जाए, अर्थ बदलने की संभावना बहुत कम होती है। यह इसलिए होता है कि इस भाषा में सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। इसलिए मुझे यह कहने मे कोई संकोच नहीं है कि व्याकरण और वर्णमाला की जो वैज्ञानिकता हमारी इस भाषा में है, वह दूसरी किसी भी भाषा में नहीं। सूचना और संचार विज्ञान के अंतर्गत इस भाषा को वैज्ञानिकों ने इसी आधार पर सर्वाधिक उपयोगी भी माना है।
पिछले दिनों में जो महत्त्वपूर्ण भाषाई शोध हुए हैं उनमें कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी में संस्कृत को सर्वाधिक उपयुक्त भाषाओं में से एक माना गया है। वर्ष 1985 में नासा के अनुसंधानकर्ता रिक ब्रिग्स ने विज्ञान पत्रिका में लिखे एक शोध पत्र 'नॉलेज रिप्रेजेंटेशन इन संस्कृत एंड आर्टिफिशियल लैंग्वेज ' शीर्षक के साथ कई महत्त्वपूर्ण तथ्यों का अन्वेषण किया था। इसमें कम्प्यूटर से बात करने के लिए प्राकृतिक भाषाओं के उपयोग से जुड़ी अहम बातें समाहित थीं। इसमें संस्कृत का जिक्र सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक होने और लिपि के तौर पर काफी समृद्ध होने के लिए किया गया था। इस जिक्र की मूल वजह यह थी कि इसका व्याकरण ध्वनि आधारित है। इसमें शब्द की आकृति से ज्यादा ध्वनि को अधिक वैज्ञानिक और आसान मानते हुए इसके जरिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी में इसके उपयोग की सुगमता पर विचार किया गया। आज तो दुनिया के देशों में ऐसे विश्वविद्यालय खुल गए हैं जो संस्कृत और उसके ज्ञान को समर्पित हैं। यही संस्कृत की ताकत है जिसने दुनिया को आकृष्ट किया है। 'संस्कृत' का अर्थ ही है, संस्कार। शब्दों की अधिसंख्य देन के कारण यह आज भी प्रासंगिक है। संस्कृत को देवभाषा कहे जाने पर सवाल भी उठते हैं पर इसके मूल कारणों पर जाएंगे तो लगेगा कि यह विशेषण यों ही नहीं है। संस्कृत में ही ज्ञान के जो विशिष्ट ग्रंथ लिखे गए उनसे हम आज भी लाभान्वित हो रहे हैं। यह तो आलोक प्रदान करने वाली भाषा है। देवता वह जो हमें ज्ञान का आलोक देते हैं। इसीलिए कहा गया है—
देवो दानाद्वा दीपनाद्वा
द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा।
यो देव: सा देवता इति।
अर्थात्- जब देव वेद मंत्र का विषय बन जाते हैं, तब वह देवता हो जाते हैं। देवता वह जिससे किसी शक्ति को प्राप्त करने की प्रार्थना या स्तुति की जाए और वह जी खोलकर देना आंरभ करे। संस्कृत, देवों के इसी स्वरूप को बताती है। ज्ञान के महान शास्त्र और वैदिक ग्रंथों का आलोक देने के कारण यह देव भाषा है। विश्वभर के ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का महत्त्वपूर्ण और सूक्ष्म अध्ययन कहीं उपलब्ध है तो वह संस्कृत में ही है। व्याकरण के क्षेत्र में पाणिनी और पतंजली, औषधि में चरक और सुश्रुत, खगोलशास्त्र और गणित में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर, दर्शन में गौतम व आदि शंकराचार्य आदि के साथ ही कलाओं के आदि ग्रंथ संस्कृत में ही रचे गए। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, जिसकी अभिनव गुप्त ने व्याख्या की वह सभी कलाओं का सार है।
देखा जाए तो संस्कृत अपने आप में एक पूर्ण भाषा है। संस्कृत विद्वान इस भाषा में उपलब्ध गूढ़ ज्ञान को अनुवाद के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य करें। अभी भी कई संस्कृत ग्रंथों में निहित ज्ञान की व्याख्या अन्य भाषाओं में नहीं हो पाई। विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भरत मुनि का नाट्यशास्त्र, अष्टाध्यायी आदि को, आधुनिक संदर्भों में, भारतीय भाषाओं और सहज संस्कृत में यदि व्याख्यायित कर सुगम रूप में पहुंचाने के प्रयास हों तभी हम संस्कृत के जरिए हमारी संस्कृति को अधिकाधिक रूप में जीवंत कर पाएंगे। आइए, हम भारतीय संस्कृति के आलोक से जुड़ी इस भाषा से जन-जन को प्रकाशित करने का प्रयास करें।
Published on:
12 Aug 2022 08:41 pm
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