
Rajasthan Assembly
इस देश में सत्य की जीत स्वयं में एक उत्सव है। राज्य विधानसभा में सोमवार को की गई यह घोषणा कि सरकार काले कानून बनने वाले विधेयक को प्रवर समिति से वापस लेती है, राज्य के लिए ऐतिहासिक अवसर है। पहली बधाई जनता जनार्दन को। उसने जब दिया दिल खोलकर दिया और जब छीना तो समय रहते अलवर और अजमेर में दिखा दिया।
दूसरी बधाई पत्रिका के कर्णधार चि. निहार और चि. सिद्धार्थ को, उनकी पूरी टीम को। मैंने तो अपनी ओर से एक मौन सत्याग्रह शुरू करके सरकार से संघर्ष का श्रीगणेश कर दिया। खतरे तो इन लोगों को ही उठाने पड़े। हां, आज श्रद्धेय बाबूसा (कुलिश जी) स्वर्ग से भी इनको आशीष दे रहे होंगे। जहां मीडिया पैसे में बिक रहा है, इन्होंने अपने हौसले को बनाए रखा और मुझे भी आश्वस्त करते रहे।
तीसरी बधाई राज्य सरकार को, स्वयं मुख्यमंत्री राजे को, जिन्होंने अपने अहंकार पर लगी चोट को भूल हंसते हुए अपना कदम वापस लिया। उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले समय में कुछ बदलेगा। इस कानून को बनने से रोककर सरकार ने संविधान और लोकतंत्र के प्रति सम्मान ही जताया है।
एक बड़ा तथ्य सामने जो आया, वह गंभीर है। अध्यादेश छह सितम्बर २०१७ को जारी हुआ था। २३ अक्टूबर २०१७ को दण्ड प्रक्रिया संहिता राजस्थान संशोधन विधेयक २०१७ के रूप में विधानसभा में रखा गया था और उसी दिन प्रवर समिति को भी सौंप दिया गया था। पिछले पांच महीनों में किसी को भी इस विधेयक की आंच महसूस ही नहीं हुई। इसी सत्र में प्रवर समिति का कार्यकाल ६ माह बढ़ा दिया गया। विपक्ष चाहता तो बड़ा आन्दोलन खड़ा कर सकता था। सत्ता पक्ष के इतने सारे विधायक और सब मौन (घनश्याम तिवाड़ी के अलावा)। क्या होगा उनके दिलों पर जो इस विधेयक को प्रासंगिक बता रहे थे। क्या इन सबके व्यवहार को देखकर लोकतंत्र की आत्मा इनको नहीं कचोटेगी? सबने जनता को धता बताकर अपने-अपने स्वार्थ साध लिए।
आज विधानसभा में १९ जुलाई सन् १९७७ का राज्यपाल का वक्तव्य सुनाया, वह इस काले अध्यादेश पर भी हूबहू लागू होता है। उसे दोहराना भी उपयुक्त ही होगा। ‘आपातकालीन स्थिति देश के इतिहास में एक काला पृष्ठ है। एक व्यक्ति को सत्ता में बनाए रखने के लिए सारे देश को भयंकर उत्पीडऩ सहना पड़ा। हजारों लोग अकारण ही जेलों में डाल दिए गए। गिरफ्तारी व यातनाओं से एवं समाचार प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाकर देश में भय का वातावरण उत्पन्न किया गया।
व्यक्ति पूजा इस हद तक पहुंची कि देश को एक ही व्यक्ति का पर्याय समझा जाने लगा। न्यायपालिका के अधिकारों को सीमित कर दिया गया। यहां तक कि संसद में प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई। सत्ता के गैर संवैधानिक केन्द्रों द्वारा सत्ता का खुले आम दुरुपयोग किया गया। विरोधी दल के सम्मानित नेताओं के विरुद्ध झूठा एवं अनर्गल प्रचार निरन्तर चलता रहा।’
प्रदेश के इतिहास का काला पृष्ठ बनने से रोक लेना जरूर जनहित में होगा। किन्तु गहराई से समझने की बात यह है कि क्या सरकार के इस प्रयास को जनता भी कभी भूल पाएगी? इसे भुलाना ही सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहेगी।

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