
आत्म-दर्शन : इल्म की अहमियत
इस्लाम ने इल्म यानी ज्ञान हासिल करने को बहुत ज्यादा अहमियत दी है और लोगों को ज्यादा से ज्यादा इल्म हासिल करने के लिए प्रेरित भी किया है। इस्लाम में इल्म की हैसियत और महत्त्व का अंदाजा इस बात से हो जाता है कि लगभग चौदह सौ साल पहले कुरआन का जब अवतरण हुआ, तो उसमें पहली बार जो सूरा (अध्याय) अवतरित हुआ, उस सूरा का पहला शब्द 'इकरा' था। इकरा का मतलब पढऩे से है।
कुरआन के अवतरण की शुरुआत ही पढऩे के आह्वान के साथ हुई। ज्ञान की अहमियत को दर्शाते हुए ही कुरआन कहता है, 'क्या वे लोग जो जानते हैं और क्या वे लोग जो जानते नहीं हैं, बराबर हो सकते हैं?' (39:9) कुरआन कहता है, और कहो, 'मेरे रब, मुझे ज्ञान में अभिवृद्धि प्रदान कर।' (20:114)
पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने फरमाया-इल्म हासिल करना हर मुसलमान का फर्ज है। मुहम्मद साहब ने यह कहा कि मां की गोद से लेकर कब्र में जाने तक इल्म हासिल करते रहो। उन्होंने यह भी कहा कि जो इल्म तलाशने के लिए एक मार्ग का अनुसरण करता है, तो ईश्वर उसके लिए स्वर्ग का रास्ता आसान कर देता है।
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