
आत्म-दर्शन : आहार की शुद्धता
बहता हुआ झरना बहुत आकर्षक होता है, लेकिन उससे बिजली उत्पन्न करने के लिए उसके बहाव को बांधना ही पड़ता है। कुछ ऐसा ही हमारे जीवन के साथ भी है। अल्हड़ जीवन की खूबसूरती बेशक अनुपम, बेजोड़ होती है, लेकिन उसे सार्थक दिशा देने के लिए अनुशासन आवश्यक होता है। अनुशासन की प्रक्रिया ने मनुष्य जीवन को चार सिद्धांत दिए हैं - आहार, विहार, विचार और आचार। आहार का संबंध मनुष्य के खान-पान से है, विहार का उसके रहन-सहन से। इसी तरह, विचार का संबंध सोचने-समझने की शक्ति और उसके तरीके से है, जबकि आचार का संबंध जीवन के उस पहलू से है, जिसके द्वारा हम एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं। धन-संपत्ति का विकास सच्चा विकास नहीं है। जिसके जीवन में सदाचार नहीं, आहार-विहार पवित्र नहीं, वह कितना भी धनवान और शक्तिमान क्यों न हो, आत्मिक दृष्टि से दरिद्र ही है। ‘आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि, सत्व शुद्धो ध्रुवा स्मृति:। स्मृतिर्लब्धे सर्वग्रन्थीनां प्रियमोक्ष:।।’ अर्थात्, आहार के शुद्ध होने से अन्त:करण की शुद्धि होती है, अन्त:करण के शुद्ध होने से बुद्धि निश्छल होती है और बुद्धि के निर्मल होने से सब संशय और भ्रम जाते रहते हैं, तब मुक्ति का मिलना सुलभ हो जाता है। आहार व्यतिक्रम अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियों का मूल है। अत: आहार शुद्ध-सात्विक और संतुलित हो। यह बात हमेशा ध्यान रहे कि देह-देवालय एवं जीवन-सिद्धि का स्वाभाविक स्रोत है। आहार का स्थूल प्रभाव अंग-अवयवों पर पड़ता है, पर उसकी सूक्ष्म शक्ति मनुष्य के अन्तराल तक जा पहुँचती है और अपना समुचित प्रभाव छोड़ती है। इसलिए साधना के दिनों में उपवास का नियम है। फलाहार दूध, छाछ पर रहकर साधक अपना साधना क्रम पूरा करते हैं।
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