
आत्म-दर्शन : मन, वचन व काय
मुनि प्रमाण सागर
धर्म का कार्य अगर करो तो मन, वचन, काय से करो और पाप का काम अगर करो तो जहां रुक सको वहां रुको। धर्माचार करो, पर मन में कुछ दूसरा हो, वचन में कुछ दूसरा हो और क्रिया में कुछ दूसरा हो तो हमें धर्म का सच्चा फल नहीं मिल सकता। यदि मन में कुटिलता रख कर के धर्माचरण करेंगे, तो उसका फल नहीं मिलता। व्यवहार के क्षेत्र में मन, वचन और काय में अंतर भी करना पड़ता है। लोक व्यवहार में मनुष्य एकाएक अपनी दुष्प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पाता।
इस हालत में अगर मन में पाप आए तो उसे मन तक सीमित रखो, वचन में न आने दो। वचन में पाप आया है, तो उसे वचन तक रोक दो, व्यवहार में मत आने दो। मतलब अपनी खोटी प्रवृत्ति को जिस स्तर पर रोकने की स्थिति हो, उसी स्तर पर रोकने की चेष्टा करनी चाहिए।
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