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जरूरी है न्यायिक सुधारों की दिशा में गंभीर पहल

जुलाई 2006 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाइ. के. सभरवाल ने अदालतों को दो शिफ्टों में चलाने का सुझाव दिया था। उनकी मान्यता थी कि अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों और कर्मचारियों की मदद से इसे मूर्त रूप दिया जा सकता है। गुजरात ने इस दिशा में पहल की और इसके अच्छे परिणाम आए हैं।

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प्रो. हरबंश दीक्षित
डीन, विधि संकाय, तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद
अदालतों में मुकदमों की बढ़ती हुई संख्या पर एक बार फिर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। हाल ही सम्पन्न जिला अदालतों के राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश तथा केन्द्रीय विधि मंत्री ने एक स्वर से इस समस्या को हल करने पर बल दिया है। इस वजह से एक बार फिर इस समस्या की तरफ सभी का ध्यान गया है। देश के 90 फीसदी मुकदमे निचली अदालतों में लम्बित हैं, जहां मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। देश की अदालतों के सामने तकरीबन 4.5 करोड़ मुकदमे लम्बित हैं। इसमें से करीब एक लाख मुकदमे ऐसे हैं जो पिछले 30 वर्षों से अदालत की फाइलों में भटक रहे हैं। मुकदमों के निपटारे में दशकों लग जाते हैं। मुकदमों की संख्या अगर इसी तरह से बढ़ती रही तो 2040 तक अदालतों के सामने 15 करोड़ मुकदमे होंगे और तब तक जनता का धैर्य जवाब देने के कगार तक पहुंच जाएगा जो समाज और न्यायपालिका के लिए बहुत दुखद होगा। हमारे देश में अदालतों की भारी कमी है। दूसरी आपात सेवाओं की तरह ही अदालतें खोलने के लिए न्यायाधीशों और कर्मचारियों की संख्या में कम से कम तीन गुना वृद्धि करने की जरूरत है। सबसे बड़ी समस्या न्यायाधीशों की कमी की है। इस समय देश की अदालतों में न्यायाधीशों के तकरीबन 19000 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 18000 पद निचली अदालतों में हैं।
पिछले दशकों में मुकदमों के दायर होने की संख्या में 12 गुना इजाफा हुआ है, जबकि इस दौरान न्यायाधीशों की संख्या मुश्किल से तीन गुना बढ़ी है और उसमें से भी कम से कम पन्द्रह फीसदी पद हर समय खाली रहते हैं। भारत में हर दस लाख की आबादी पर न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 21 है। इनमें से भी तकरीबन 30 फीसदी पद खाली ही रहते हैं जबकि अमरीका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन तथा न्यूजीलैंड में यह संख्या 90 से 110 तक है। विधि आयोग ने अपनी 120वीं रिपोर्ट में प्रति दस लाख आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या को 50 करने का सुझाव दिया था। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अपने 'आल इण्डिया जजेज एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2002)' के मुकदमे में सरकार को अदालतों की संख्या बढ़ाकर प्रति दस लाख आबादी पर कम से कम 50 करने का निर्देश दिया था, किन्तु पिछले 12 वर्षों में यह 11 से बढ़कर किसी तरह 20 तक पहुंच पाई है। इसके अलावा भारत में कानूनों की बढ़ती संख्या, छोटे-मोटे विवादों को निपटाने में कार्यपालिका की उदासीनता, अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग की प्रवृत्ति, भ्रष्टाचार तथा अन्य दूसरे कारणों से मुकदमों की संख्या में होने वाली बेतहाशा वृद्धि ने आबादी और अदालतों के अनुपात को बेहद असंतुलित बना दिया है।
सुलह समझौते जैसी अनौपचारिक पद्धतियों के द्वारा मुकदमों की संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है। इसके लिए मध्यस्थ और सुलह अधिनियम को नया स्वरूप दिया जा चुका है। दीवानी और दण्ड प्रक्रिया कानूनों में संशोधन करके इस काम को आसान बनाने की कोशिश की गई है। लोक अदालतों ने भी अपनी ओर से कोशिश की, किन्तु मुकदमों की संख्या में कुछ खास अंतर नहीं आ पाया। ऐसे हालात में कुछ ऐसे गैर पारम्परिक तरीकों को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने की जरूरत है जिन्हें लागू करने में अब तक सरकार और न्यायपालिका की ओर से की गई पहल का कोई खास फर्क नहीं पड़ सका है। संसद ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए 2008 में ग्राम न्यायालय अधिनियम पारित किया था। इसमें पंचायत स्तर पर न्यायालयों की स्थापना करके छोटे-मोटे दीवानी और फौजदारी मुकदमों को वहीं पर निपटाने की व्यवस्था है। भारत में ग्राम न्यायालयों की सुदीर्घ परम्परा रही है, किन्तु राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे कुछ राज्यों को छोड़ दें तो अन्य कहीं भी इसकी अभी शुरुआत तक नहीं की जा सकी है। अब समय आ गया है कि हर प्रकार के पूर्वाग्रह छोड़कर इस व्यवस्था पर अमल किया जाए। एक बार शुरुआत हो जाने पर फिर रास्ते में आने वाली अड़चनें अपने आप दूर होती रहती हंै।
जुलाई 2006 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाइ. के. सभरवाल ने अदालतों को दो शिफ्टों में चलाने का सुझाव दिया था। उनकी मान्यता थी कि अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों और कर्मचारियों की मदद से इसे मूर्त रूप दिया जा सकता है। गुजरात ने इस दिशा में पहल की और इसके अच्छे परिणाम आए हैं। इस तरह की अदालतों को छोटे-मोटे फौजदारी और दीवानी मामलों के निपटारे का अधिकार देकर मुकदमों के बोझ को काफी कम किया जा सकता है। ढांचागत सुविधाओं के लिए एकमुश्त ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरे पेंशनभोगी न्यायाधीशों और कर्मचारियों को उनके पेंशन और वास्तविक वेतन के अंतर का भुगतान करना होगा। इन उपायों से न्यायिक सुधारों की दिशा में दीर्घकालिक सफलता प्राप्त की जा सकती है।