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संपादकीय: सोशल मीडिया से जुड़ी अराजकता बड़ी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई गई कि क्या आरोप सिद्ध होने से पहले ही किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत नहीं है?

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डिजिटल क्रांति के दौर में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। लेकिन जब इसके दुरुपयोग के खतरे सामने आते हैं तो चिंता होना स्वाभाविक है। ताजा चिंता सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कहते व्य्क्त की है कि आज मोबाइल रखने वाला हर व्यक्ति स्वयं को 'मीडिया' समझने लगा है। चिंता यह भी कि इस दुष्प्रवृत्ति के साथ आई अराजकता अब न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती बनती जा रही है।

दरअसल, शीर्ष अदालत उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस गिरफ्तार किए गए लोगों की फोटो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर डाल देती है। इससे लोगों के मन में पहले से ही आरोपी के खिलाफ धारणा बन जाती है। बाद में अगर सबूतों के अभाव में कोर्ट उसे बरी कर दे तो लोग सवाल उठाने लगते हैं। पुलिस की यह भूमिका तो चिंताजनक है ही, अदालत ने यह भी कहा कि केवल पुलिस के सोशल मीडिया अकाउंट की बात करने से काम नहीं चलेगा। पुलिस को तो एसओपी से नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन आम आदमी को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, यह बड़ा सवाल है। हादसे के समय लोगों की पहली प्रतिक्रिया पीडि़त की मदद करना नहीं, बल्कि वीडियो बनाना हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई गई कि क्या आरोप सिद्ध होने से पहले ही किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत नहीं है? अन्य लोकतांत्रिक देशों की तुलना में भारत में इस विषय पर स्पष्ट और कठोर नियमों का अभाव दिखाई देता है।

कई देशों में आरोपी की फोटो तभी जारी की जाती है जब वह फरार हो, सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा हो या उसकी पहचान से जांच में ठोस मदद मिल सकती हो। यूरोप के कुछ देशों में तो दोष सिद्ध होने से पहले पहचान उजागर करना कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है और अक्सर चेहरे को धुंधला करके ही आरोपी की फोटो प्रकाशित की जाती है। इसके विपरीत भारत में यह निर्णय अक्सर परिस्थितियों और विवेक पर छोड़ दिया जाता है, जिससे असमानता और अतिरेक दोनों की संभावना बनी रहती है।

दरअसल समस्या तकनीक की नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग की है। सोशल मीडिया में जिम्मेदारी का भाव विकसित नहीं हुआ। बिना सत्यापन के सामग्री साझा करना, अधूरी जानकारी के आधार पर राय बनाना- ये सब लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत हैं। इस संदर्भ में केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। डिजिटल साक्षरता, मीडिया नैतिकता और नागरिक जिम्मेदारी पर व्यापक जनजागरण आवश्यक है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, सरकार और नागरिक समाज- सभी को मिलकर ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसमें सूचना की स्वतंत्रता और न्याय की निष्पक्षता दोनों सुरक्षित रह सके। आरोपी की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितने कि पीडि़त के अधिकार।